गीत : 'मैं क्या करूँ '-- "काव्य-सुमन से "
राम चन्दर 'आज़ाद '
गीत : 'मैं क्या करूँ '-- "काव्य-सुमन से "
उठ रही हैं समुन्दर में लहरें बहुत ,
पर किनारे न पहुंचे तो मैं क्या करूँ ?
नाव लेकर के नाविक चला था मगर ,
बीच में डूब जाये तो मैं क्या करूँ ?
पर किनारे न पहुंचे तो मैं क्या करूँ ?
नाव लेकर के नाविक चला था मगर ,
बीच में डूब जाये तो मैं क्या करूँ ?
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एक तस्वीर थी दिल के अरमान की ,
जिसको अपने जेहन में छिपा कर रखा ,
छुट कर हाथ से गिर पड़े वह अगर ,
और वह टूट जाये तो में क्या करूँ ?
जिसको अपने जेहन में छिपा कर रखा ,
छुट कर हाथ से गिर पड़े वह अगर ,
और वह टूट जाये तो में क्या करूँ ?
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आँख में आंसुओं को रखा बंदकर ,
चूं पड़े न कहीं ये तुम्हे देखकर ,
डबडबाई हुई अश्रु संचित किये ,
गर टपकने लगीं तो मैं क्या करूँ ?
चूं पड़े न कहीं ये तुम्हे देखकर ,
डबडबाई हुई अश्रु संचित किये ,
गर टपकने लगीं तो मैं क्या करूँ ?
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दिल की धड़कन कहीं तेज हो जाये ना ,
इसलिए मोड़ मुँह को चला मैं उधर ,
उनके क़दमों की आहट को सुनकर के ही ,
दिल धड़कने लगा यदि तो मैं क्या करूँ ?
इसलिए मोड़ मुँह को चला मैं उधर ,
उनके क़दमों की आहट को सुनकर के ही ,
दिल धड़कने लगा यदि तो मैं क्या करूँ ?
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