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Friday, January 29, 2016

चंचल मन मेरो कहा न माने |



चंचल मन मेरो कहा न माने |

जब  जब इसको  रोकन चाहूँ  सुनत न  बात  सयाने |
इक पल रुकत पुनः फिर भाजति  नाना  करत  बहाने||

करम धरम और योग  ध्यान में कुछ पल रुकत रुकाने |
जैसहि  थोड़ा  अवसर  पावत  करत   अन्यत्र  पयाने ||

बीते पल  को सोचि- सोचि  कर  लागत  अश्रु  बहाने |
कहि ‘आजाद’ कछु समझ न आवत काम करत मनमाने ||

कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर ‘आजाद’
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़ ,झालावाड़ (राज.)

मोबाईल- 9414750971 

Monday, January 25, 2016

हमारा तिरंगा

        हमारा तिरंगा

    यह तिरंगा जो हमारे देश का अभिमान है |
           और हम सारे वतन के वासियों की शान है |
    जान पर भी खेलकर झुकने नहीं देंगे इसे ,
           बूंद- बूंद रक्त भी इसके लिए कुर्बान है |

    यह शहीदों की अमर गाथा सुनाता है हमें ,
           शौर्य और पराक्रम की बातें बताता है हमें |
    इसके लहराने में जैसे नौजवानों की है मस्ती ,
           लहरकर उनकी विजय गाथा सुनाता है हमें ||

    हरे रंग से धरती की हरियाली इसको प्यारी है |
       जंगल बाग़ खेत उपवन में इसकी ही छवि न्यारी है |
    श्वेत रंग सच्चाई के पथ पर चलने का देता ज्ञान ,
        सदा सत्य पर चलो साथियों इसमें जीत तुम्हारी है ||

    केसरिया रंग हम में साहस कूट-कूट भर जाता है |
         उठो जवानों !आगे आओ तुमको देश बुलाता है |
    समय चक्र देता संदेशा आगे बढ़ो हे भारतवीर !
         नहीं समय की क़द्र करे जो जीवन भर पछताता है ||




          


Saturday, January 23, 2016

क्रांति की ज़रूरत



    

क्रांति की जरुरत 





एक क्रांति तो  पहले हुई थी गोरों को  मार भागने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

चले गए अँग्रेज मगर  अंग्रेजीपन को  छोड़ गए |
शासन प्रशासन में अपने पुतले वंशज छोड़ गए |
वैसी  भाषा  वैसी बानी  खानपान भी  वैसा है |
लूटपाट का  वही तरीका  अकड़ फिरंगी जैसा है ||

इनको  कोई कुछ  कह दे तो  आदत इनकी गुर्राने की |  
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

रोज  शहीद  हुआ करते  हैं  सैनिक  सीमाओं पर ,
फिर भी दिल्ली क्यों चुप दिखती ऐसी घटनाओं पर ?
बस केवल दो चार दिवस अफ़सोस जताया जाता है |
उनकी वीर कथाओं का  गुणगान  सुनाया जाता है ||

भाषण- भूषण दौड़ा- दौड़ी जनता  को बस दिखलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

आज तिरंगा जाने क्यों मायूस  दिखाई पड़ता है ?
राष्ट्रगान में शौर्य नहीं अब शोर सुनाई पड़ता है |
लोकतंत्र की अरथी उठती मगर किसे परवाह है |
अपनी कुरसी रहे सलामत नहीं और कुछ चाह है ||

रोज- रोज वादे  करते जनता  को फिर से फुसलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

भ्रष्ट्राचार और अनाचार से धरा हो  गई है  बोझिल |
प्रेम और सौहार्द्र से सूखे सभ्य जनों के दिखते दिल |
इज्ज़त बे-इज्ज़त होने में कोई समय नहीं लगता है |
अपराधी सीना ताने अब  कानून  को गाली देता है ||

क्या यही था भारत का सपना जिस पर मर मिटजाने की ?
एक क्रांति  की आज जरुरत जनगण  मन को जगाने की ||










चल सजनी उस देश


चल सजनी उस देश......


चल सजनी उस देश ,

जहाँ तेरो प्रीतम रहते |

बहुत दिनन से खबर  न आई  नहिं  पाती सन्देश |

ना जाने  किस हाल  में होंगे  मन में उठत क्लेश |

तन मन को कछु नीक न लागै साँस बची बस शेष |

रात न बीतत दिन नहिं आवत भावत  नहिं परिवेश |

प्रीतम  गेह  दूर अति  हौवे नहिं  कोई संग विशेष |

तम का मार्ग  कंटकमय जहाँ ऐसो  प्रीतम का देश |

मन आज़ाद मिलनों को चाहे बिनु किए इक छन लेश ||







Wednesday, January 20, 2016

सखि, मन मेरो स्थिर नाहीं |


सखि, मन मेरो स्थिर.........


सखि, मन मेरो स्थिर नाहीं |
पिया  प्रेम में  भयौ दिवानो, बसत है उनकी ठाहीं |
भ्रमर रूप धरि चहुँदिश भटकत,पास टिकट है नाहीं |

सोचि-सोचि कर कबहूँ हँसूं तो छन उदास होई जाहीं |
नैननि सो भयौ नींद नदारद मन कछु समझत नाहीं |

बिसरावन की लाख जुगति करि सपनन परत दिखाहीं |
मन ‘आजाद’ पिया के बस में करी सकती कछु नाहीं ||

Sunday, January 17, 2016

समझौता

             समझौता
   समझौता सचमुच में कायरता की एक निशानी है |
    समझौते पर अमल न करना बहुत बड़ी नादानी है |
    ऐसे  समझौते  को समझौता  कहना  बेईमानी है|
    जिसकी शत्रु उड़ाए खिल्ली और करे मनमानी है ||
   
    वासुदेव समझौता लेकर कौरवराज के पास गए |
    समझौते को कमजोरी कह कौरव सब अट्टहास किये |
    अर्ध राज्य पाण्डव को दे दें जब ऐसा प्रस्ताव दिया |
    अभिमानी दुर्योधन ने तो सभा में ही परिहास किया ||

पाँच गाँव लेकर भी पांडव समझौते पर राजी हैं |
शेष राज्य पर राज करो उनको न कोई नाराजी है |
इस कुरुवंश में तुम सबका भाई-भाई का नाता है |
पाँच गाँव से हे दुर्योधन ! भला बता क्या जाता है?

राज्य कोई है भीख नहीं जो भिक्षा में उनको दूँ |
ऐसे कायर भिक्षुक को अपना भाई कैसे कह दूँ |
बिना युद्ध के नहीं सूचिका भर भी भूमि उन्हें दूँगा |
ऐसे समझौते को माधव ! नहीं कभी सहमति दूँगा ||

समझौते की कदर न करना पाकिस्तान को भाता है |
इसीलिए दुर्योधन बन वह सबकी हँसी उड़ाता है |
भारत रथ की पकड़ डोर माधव बनकर आना होगा |
अर्जुन बन नापाक पाक को सबक सिखाना ही होगा ||

धृतराष्ट्र सम अन्धा वह पाक वज़ीर कुचाली है |
उसकी आतंकवाद के आगे दाल न गलने वाली है |
आतंकवाद के साये में ही साँस ले रहा बेचारा |
उनके कुछ खिलाफ कहने से जान से जाएगा मारा ||

इसीलिए अब  पाक  वार्ता करना  ही बेकार है |
आतंवादियों के आगे  वह  बेबस और लाचार है |
जो होता है हो जाने दो फिकर नहीं करना होगा |

ऐसे क्रूर कुकर्मी को तो  कर्म-दण्ड  सहना होगा ||

कवि एवं साहित्यकार - राम चंदर 'आजाद'

ज.न.वि. पचपहाड़ ,जिला- झालावाड़ (राज.)
मोबा.9414750971



Monday, January 11, 2016

भिखारी

    भिखारी


वह त्याग तपस्या की प्रतिमा
वह सहनशीलता की मूरत
जी, आप समझते होंगे कि
वह कोई संत पुजारी है 
जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं
वह तो बस एक भिखारी है ||
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कौवे पर उसकी नज़र अडी
है चोंच में रोटी जिसके पड़ी
जी ,आप समझते होंगे कि
वह कोई चतुर शिकारी है |
जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं
वह तो बस एक भिखारी है ||
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जो जाति ,धर्म का भेद न जाने
जो मानव को बस मानव ही माने
जी ,आप समझते होंगे कि
वह कोई धर्माधिकारी है |
जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं
वह तो बस एक भिखारी है ||
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सब ऋतुओं में रहता समान
अपमान मान दोनों समान
जो मिल जाता खा लेता है
रूखा –सूखा ,ताज़ा-बासी
जी ,आप समझते होंगे कि
यह किसी की लाचारी है
जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं
वह तो बस एक भिखारी है ||










Saturday, January 9, 2016

आखिर कब तक

आखिर कब तक.........

कब तलक रोती रहेंगी सरहदें  आखिर हमारी |
अब तो इसके वास्ते  इंतजाम  होना चाहिए ||
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अब तो दुश्मन में नहीं शायद बची इंसानियत,
उसके माफिक अब  कोई पैगाम होना चाहिए ||
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कब  तलक  रोएँगी माँएं  और बहने, बेटियाँ ,
कोई  पुख्ता इसका  एहतमाल  होना चाहिए ||
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कब तलक खोते रहेंगे अपने नौजवानों को हम,
इस की  चर्चा अब तो  सरेआम होना चाहिए ||
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शर्म आती है नहीं उन्हें अपने धूर्त कारनामों पर,
अब तो सच ‘आज़ाद’ कोई कुहराम होना चाहिए || 


Thursday, January 7, 2016

मन तरंग

दोहे – मन तरंग
पुष्प पियारो तबहि तक ,जब  तक खुशबू होय |
खशबू के चलि जात ही ,फिर नहिं पूछत कोय ||1||
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बुरा बसत  है मन तेरो ,सो  जग बुरा दिखाय |
भला जो देखन लागिहों ,फिर नहिं बुरा दिखाय ||2||
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मधुर वचन मिसरी लगै, कटुक नीम सम होय |
जिह्वा पर जैसहि रखत , मन में  मिचली होय ||3||
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दुनिया है बहु काम की, कुछ  करिके तो देख |
खुद को  यूँ  नहिं  कोसिये, अपने  अन्दर देख ||4||
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कहि आजाद मन साफ़ तो ,का करी सकत कलंक |
कमल  सदा  ही खिलत हैं , नीर  होहिं  या  पंक ||5||
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रोग लखै नहिं जाति कुल , रोग लखै  नहीं धर्म |
सच्चा मानव  वह  हवै, रोग  समहि  जेहि  कर्म ||6||
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परहित सम नहि धर्म कोइ ,अनहित सम नहिं पाप |
अब  अपने   को  तौलिये ,  किसमें   आते   आप ||7||
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लाठी में जल मारिये , जल  में  पड़े न  फर्क |
ऐसहि  जिद्दी  लोग से , व्यर्थ  करब  है  तर्क ||8||
-‘आजाद सतसई’ से
दोहाकार- राम चंदर ‘आजाद’