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Wednesday, December 30, 2015

नववर्ष मंगलमय हो


नववर्ष मंगल हो ........

नई उमंगें ,नई तरंगे लेकर संग में हर्ष |
खुशियों का संदेसा लेकर आया है नववर्ष ||

नाचें   गायें ,   धूम   मचाएं ,
एक साथ मिल ख़ुशी मनाएं |
आशाओं  के दीप जले , हो मंगलमय नववर्ष || खुशियों का ....

नई  चेतना ,  नई  कल्पना ,
नई सृष्टि का लेकर सपना |
स्थापित हो मानवता का एक नया प्रतिदर्श || खुशियों का ....

विगत वर्ष की बातें तजकर ,
सपने नए बुने हम मिलकर |
देकर ख़ुशी ,ख़ुशी हम पायें  ले संकल्प सहर्ष || खुशियों का ....

जाति, धर्म से ऊपर उठकर ,
देश- प्रेम  की डोर पकड़कर |
औरों के हित जीना सीखें करें प्रगति संघर्ष || खुशियों का ....






Saturday, December 26, 2015

फोटो ग्राम्य दर्पण


यह मेरी कहानी संग्रह की पुस्तक 'ग्राम्य-दर्पण 'है जो अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है जिसमे कुल 25 कहानियाँ हैं |





मैं परदेशी यह देश न भावै |


मैं परदेशी यह देश न भावै |


मैं परदेशी यह देश न भावै |


अपना अपना  जेहि को  समझा वो मारन को धावै ||

हँसना चलना जेहि सिखायौ वहि अब मोहि रुलावै || 

स्वारथ बस सब आपन बोलत फेरि न सम्मुख आवै ||

प्रेम फाँस निकसै नहिं देवै उलझि- उलझि रहि जावै ||
 
माया मोह ने ऐसो बाँध्यौ  कछू  समुझि नहिं आवै ||

कहि ‘आजाद’ रूठ्यौ परदेशी  अपन देश को सिधावै ||


Wednesday, December 23, 2015

बुरे बखत कोई काम ना आवै |





बुरे बखत कोई काम ना आवै |

ब तक  मछरी  पानी  भीतर  सब संग धूम मचावै |

जैसहि  जाल  बीच  है  फँसती  छोडि  सबै भगि जावै ||***********************************

घायल  हरिना  वन -वन  भागै  कतहूँ ठौर नहिं पावै |

उसके रकत  खुदहि   नावक   को हरिना तक पहुंचावै ||

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 संगी - साथी   मारग   बदलत  बात  करत  सकुचावै |

कछु  कहने   से   पहले  ही  वह  अपनी  बिथा  सुनावै ||

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हीं मदद नहीं माँगहि हमसों मनहिं मनहिं घबरावै |

कहि 'आजाद' ऐसो समया  मा मन मिसरी नहिं भावै ||





   

Monday, December 21, 2015

मैंने तुम्हारी चाह में


   मैंने  तुम्हारी  चाह में





मैंने  तुम्हारी  चाह में  क्या –क्या  नहीं किया |
फिर तुमने मुझको इस तरह से क्यों भुला दिया ||
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जिस  दिल  के  आइने  में  तस्वीर  थी मेरी ,
तुमने  वो  सरेआम  क्यों  सबको  दिखा दिया ||
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मेरे  वास्ते  महफ़िल  में कभी  रोक नहीं था ,
किस  वास्ते  तुमने  वहाँ  पहरा  लगा  दिया ||
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ब  सिजदे- मिन्नतों  का  कोई  दौर नहीं है ,
फिर दिल के  मंदिरों  में हमें  क्यों बसा लिया ||
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माना  कि तुमने  मुझको  धोखा  नहीं  दिया ,
‘आज़ाद’  जो  किया  वो  अच्छा  नहीं  किया ||

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Friday, December 18, 2015

जीवन में खुशी के लिए


जीवन  में खुशी के  लिए


जीवन  में खुशी के  लिए संघर्ष  ज़रूरी है |
गैरों की ख़ुशी न छिने यह सबसे  ज़रूरी है ||
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वह दिल नहीं बुझदिल है नहीं प्रेम है जिसमे ,
पर दिल को  लगाने में दिल होना ज़रूरी है ||
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दिल के करीबी बनकर तो  प्यार जताते हैं ,
पर उसको निभाने में कुछ  प्यार ज़रूरी है ||
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अहसानियत के बोझ तो पैसों से नहीं चुकते ,
अहसान  चुकाना है  तो अहसान ज़रूरी है ||
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पैसों की  चमक देख जो  ईमान बेंच देते ,
ऐसे  ईमानदार  से बचना  तो  ज़रूरी है ||
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गिरवी रखी ज़मीर तो फिर क्या रहा वजूद ,
‘आज़ाद’ ऐसे लोग से  दूरी तो ज़रूरी है ||




Wednesday, December 16, 2015

सच्चा कलाकार

            सच्चा कलाकार


दमी बोले या न बोले
उसका काम बोलता है
सत्य पर चढ़े रहस्य के आवरण को
परत दर परत खोलता है |

लाख कोशिशें कर ले कोई
उसकी प्रतिभा को दबाने की
वह दब नहीं सकती बल्कि
और भी घातक हो जाती है |
जैसे किसी स्प्रिंग को 
दबाने पर होता है

ल्टा उससे कभी-कभी
भयंकर नुकसान हो जाता है |
हर आदमी अपने आप में 
एक इनाम होता है |
जिसके कारण उसका नाम होता है |
गँवाना नहीं चाहता एक भी पल
सहेजकर रखता है
स्मृतियों के पन्नों में |

च्चा कलाकार वह होता है
जो अपनी कला से 
बातें करता है बिन बोले ,
निहारता है अपलक प्रेम से |

ह सब कुछ सह सकता है
लेकिन यह शत-प्रतिशत सच है
वह खुद तबाह हो सकता है ,
मगर अपनी कला को
तबाह होते नहीं देख सकता है |





Tuesday, December 15, 2015

किससे कहूँ मैं सखी मन की बातें |

किससे कहूँ मैं सखी --------


किससे कहूँ मैं सखी मन की बातें |

गुनत धुनत  रहती  मन  भीतर  बीतत  दिन अरु रातें |

पिय परदेश न  भेजत  पाती , सपननि  मोहिं  दिखाते ||

कहु  की बातें मन नहिं  भावै ,सुनि सुनि  कान  पिराते |

सूनी  सेज   नींद   नहिं   आवै ,  नयन  खुले  रह  जाते ||

किस  किस  से  मैं  नज़र  बचाऊं,  नैनन  तीर  चलाते |

पिय 'आजाद' चले अब आओ ,तुम बिन मन अकुलाते ||










Saturday, December 12, 2015

हे सखि! रूठि गये पिय मोरे |




हे सखि! रूठि गये पिय मोरे |

कसिक  मनाऊँ मानत  नाहीं, जो कल तक थे भोरे ||

सुबह मनाऊँ, शाम  मनाऊँ ,विनति  करूँ कर जोरे ||

जब जब बात  करन को  चाहूँ , लखत न मेरी ओरे ||

जस अजनबी  बात करे  कोई, वैसे  भये  पिय मोरे ||

सब सपने अब जलत दीखते ,जो हिय रह्यौ बटोरे ||

हे 'आज़ाद' बस्यौ पिय हिय में ,तडपावत मन मोरे ||



Friday, December 11, 2015

आज़ाद के दोहे


आज़ाद के दोहे -


मैं   अपने   को    मानता ,  सबसे   बड़ा   चलाक |
पर  जब   देखा  आपको ,  मैं  रह   गया   अवाक ||1||
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हि 'अजाद' मन साफ़ हो , का करि सकत कलंक |
कमल  सदा   ही  खिलत  है  ,नीर  होहिं  या  पंक ||2||
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निरखत निरखत और  को , भयौ  सुबह  से  शाम |
अपने  को   निरखा   नहीं ,  बीत्यौ  उमर  तमाम ||3||
      *****************************
हि  'अजाद'  जब  आपने , गिरवी  रखी  ज़मीर |
फिर यह कहि  क्यों  झंखते , फूट  गई   तकदीर ||4||
    *****************************
प्रेम  खिलै   नफ़रत  मिटे , दिल  में  उठे    हुलास |
कहि 'अजाद'  जब नहिं  रहै,  कोई   आस  निरास ||5||
                                       
                                       'आज़ाद सतसई' से -

                                   
                                       





Thursday, December 10, 2015

दिल मे उल्फत


दिल में उल्फत ----




दिल में उल्फत पर निगाहों से न भरमाया करो |
सच कहूँ तो इस तरह से  ज़ुल्म  न ढाया करो ||
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लौट कर आता नहीं गुजरा  ज़माना  फिर कभी ,
इसलिए तो  कह  रहा हूँ  वक्त न  जाया करो ||
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दिल को छू  जाता है मेरे आपका मासूम चेहरा ,
आईने  में   देखकर  यूँ   न  शरमाया  करो ||         ************************
जो हकीकत है छिपाने से नहीं  छिपती  कभी ,
चाँद से चेहरे को आँचल में न  छिपाया  करो ||
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                     छा रही काँधे पे जुल्फों की घनी  काली घटाएं ,
      यूँ  हवाओं  में झटक  उनकों न फहराया करो ||
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      भा गई ‘आज़ाद’  कातिल वह लजाने की अदा ,
      सच में पलकों को झुकाकर यूँ न शरमाया करो ||






Tuesday, December 8, 2015

मौक़ापरस्त


जिसे देखो वही यहाँ पर ,
        कुछ न कुछ भुनाने  में लगा है |
कोई यश तो कोई पैसा तो ,
       कोई कोई हंसाने में लगा है |
अजी मामला यहीं नहीं थमता ,
        कोई-2 तो पहचान बनाने में लगा है ||

उलटे-सीधे बयानबाजी करके ,
          कोई तो जनप्रिय हो जाने में लगा है |
यह भी एक जीवन का सच है |
        कोई कोई किस्मत आजमाने में लगा है |
ना जाने क्यों कुछ समझ में नहीं आता ,
        इसीलिए कोई कोई मुझे समझाने में लगा है ||

दीवार ऊँची है ,चिकनी है फिर भी,
        कोई कोई छलांग लगाने में लगा है|
ये कैसा वक्त है ,आदमी स्वयं में मस्त है |
         हर कोई अपनी धुन सुनाने में लगा है |
कुछ सुनकर अनसुने कर देते हैं |
         ऐसे अन्सुनों को भी सुनाने में लगा है ||

अजीब रिश्ता है सांस का जीवन से ,
         जो शाश्वत निभाने में लगा है |
दर्द के लिए दवा तो है मगर ,
          फिर भी बेदर्द रूलाने में लगा है |
प्रीति की डोर टूट न जाए कहीं ,
            इसीलए वह आँसू बहाने में लगा है ||

ऊँचे-ऊँचे मकान हैं सड़कों के किनारे ,
          जिसे आदमी रंग-रोगन से सजाने में लगा है |
जो कल तक खँडहर था वीरान था ,
        आज वह मानव स्पर्श से जगमगाने लगा है |
सच कहा है किसी ने कभी घूरे के दिन भी लौटेंगे |
        आज के वक्त में आदमी उसे पहचानने लगा है ||








Monday, December 7, 2015

जीवन एक कहानी है |

जीवन एक कहानी है |


जीवन एक कहानी है |
    प्यार की अमिट निशानी है |
सुख-दुःख के दो पहियों पर,
    चाल   बड़ी  मस्तानी है ||

जीवन इक परिभाषा है |
    सबको इससे आशा है |
कभी नहीं जो पूरी होती ,
    यह ऐसी अभिलाषा है ||

जीवन ऐसा सपना है |
     कभी नहीं जो अपना है |
जिसे प्राप्त करने के खातिर ,
    निस-दिन सबको खपना है ||

जीवन ऐसा गीत है |
     प्यार भरा संगीत है |
होठों की मुस्काहट के संग ,
    दिलों दिलों की प्रीति है ||

जीवन एक तपस्या है |
     जिसमे कठिन समस्या है |
बार –बार बाँधा बन आती ,
    जैसे   कोई   वैश्या  है ||

जीवन एक परीक्षा है |
    पास फेल की  इच्छा है |
कभी पास तो कभी फेल बन ,
    देती  सबको  शिक्षा है ||

जीवन एक पहेली है |
    कुछ ही पल की सहेली है |
ना जाने कब साथ छोड़ दे ,
    यह  अनबुझी  पहेली है ||

जीवन ऐसी सच्चाई है |
    जिसमे खूब  लड़ाई है |
जो सचमुच में लड़ाकू है |
     पार  उसी  ने पाई है ||