कविता: अलबेला- 'काव्य-सुमन' से
राम चंदर 'आजाद' ***************************************
वह अलबेला हनफनमोला,एक दिवस हम सब से बोला !
आया था भी स्वयं अकेला ,
जायूँगा भी स्वयं अकेला !
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जब तक संग में तब तक तेरा ,
ना जाने फिर कहाँ बसेरा ?
कैसे होंगे संगी साथी ,
कैसा होगा मेरा टोला ?
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
जब तक मेरे मन में आये ,
रिश्ते -नाते मुझको भाये !
तोड़-ताड़कर रिश्ते-नाते ,
आज उड़ चला स्वयं अकेला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
रिश्ते -नाते मुझको भाये !
तोड़-ताड़कर रिश्ते-नाते ,
आज उड़ चला स्वयं अकेला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
मैंने देखा रोते सबको ,
हँसना जोर से मुझको आया !
सभी जानते हैं सच्चाई ,
फिर भी करते हल्लम-हल्ला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
हँसना जोर से मुझको आया !
सभी जानते हैं सच्चाई ,
फिर भी करते हल्लम-हल्ला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
जब आया था सब मुस्काए ,
खुशियों का त्यौहार मनाये !
बंटी मिठाई अगल -बगल में ,
खुशियाँ छाई रेलमपेला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
खुशियों का त्यौहार मनाये !
बंटी मिठाई अगल -बगल में ,
खुशियाँ छाई रेलमपेला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
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