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Tuesday, February 17, 2015

कविता: अलबेला- 'काव्य-सुमन' से


कविता: अलबेला- 'काव्य-सुमन' से

                                            राम चंदर 'आजाद' ***************************************

वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
आया था भी स्वयं अकेला ,
जायूँगा भी स्वयं अकेला !
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जब तक संग में तब तक तेरा ,
ना जाने फिर कहाँ बसेरा ?
कैसे होंगे संगी साथी ,
कैसा होगा मेरा टोला ?
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !

जब तक मेरे मन में आये ,
रिश्ते -नाते मुझको भाये !
तोड़-ताड़कर रिश्ते-नाते ,
आज उड़ चला स्वयं अकेला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
मैंने देखा रोते सबको ,
हँसना जोर से मुझको आया !
सभी जानते हैं सच्चाई ,
फिर भी करते हल्लम-हल्ला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !
जब आया था सब मुस्काए ,
खुशियों का त्यौहार मनाये !
बंटी मिठाई अगल -बगल में ,
खुशियाँ छाई रेलमपेला !
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वह अलबेला हनफनमोला,
एक दिवस हम सब से बोला !

सोचने से दर्द घट सकता नहीं !







23 hrs · Edited'काव्य;-सुमन ' से -'सोचने से दर्द घट सकता नहीं !'

राम चन्दर 'आज़ाद'-
सोचने से दर्द घट सकता नहीं -'काव्य-सुमन 'से 
सोचने से दर्द घट सकता नहीं !
सोचने से दर्द जा सकता नहीं !
इसलिए तुम सोच के सागर में 
क्यों डूबे हुए हो ?
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कब तलक पोंछोगे अपने आस्तीनों से ये आंसू ?
इस तरह से आंसुओं का वेग रुक सकता नहीं |
सोचने से दर्द घट सकता नहीं !
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द्वार तुमने बंद कर रखें हैं मन के |
किस तरह से रोशनी खुशियों की चमके ?
द्वार मन के तुम ज़रा से खोलिए,
फिर तो खुशियों की किरण से,
मुस्कराहट में इजाफा कम हो सकता नहीं |
सोचने से दर्द घट सकता नहीं !
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जिंदगी के शोरगुल से इस तरह न ऊबिये ,
उसको अपने मन के दर्पण में सजाकर देखिये |
फिर अकेलापन कभी पास आ सकता नहीं ?
सोचने से दर्द घट सकता नहीं !
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आइये कुछ बैठकर बातें करें ,
कुछ सुने मेरी व कुछ अपनी कहें |
इस तरह जब सिलसिला बातों का होगा ,
फिर तो सपनों का नया संचार होगा |
वरना दर्दे धुंध छंट सकता नहीं |
सोचने से दर्द घट सकता नहीं !
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इस तरह मायूसियत अच्छी नहीं ,
इससे तो गम की घटायें चूं पड़ेगी
और फिर तो सोच के सागर में तुमको ,
डूबने से कोई रोक सकता नहीं |
सोचने से दर्द घट सकता नहीं !

गीत : 'मैं क्या करूँ '-- "काव्य-सुमन से "

राम चन्दर 'आज़ाद '

गीत : 'मैं क्या करूँ '-- "काव्य-सुमन से "


उठ रही हैं समुन्दर में लहरें बहुत ,
                  पर किनारे न पहुंचे तो मैं क्या करूँ ?
नाव लेकर के नाविक चला था मगर ,
                  बीच में डूब जाये तो मैं क्या करूँ ?
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एक तस्वीर थी दिल के अरमान की ,
                  जिसको अपने जेहन में छिपा कर रखा ,
छुट कर हाथ से गिर पड़े वह अगर ,
                  और वह टूट जाये तो में क्या करूँ ?
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आँख में आंसुओं को रखा बंदकर ,
                   चूं पड़े न कहीं ये तुम्हे देखकर ,
डबडबाई हुई अश्रु संचित किये ,
                   गर टपकने लगीं तो मैं क्या करूँ ?
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दिल की धड़कन कहीं तेज हो जाये ना ,
                    इसलिए मोड़ मुँह को चला मैं उधर ,
उनके क़दमों की आहट को सुनकर के ही ,
                       दिल धड़कने लगा यदि तो मैं क्या करूँ ?
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