तुम शिक्षक हो -----
तुम शिक्षक हो -----
तुम शिक्षक हो
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मुँह मोड़ नहीं सकते हो ,अपने कर्तव्यों से |
तुम ही तो कुछ कर सकते हो -
नन्हें पौधे सम बच्चे में
ज्ञानांकुर को विकसित करके
और प्रेम के अमृत जल से
उसे सींचकर ,
होनहार, मजबूत वृक्ष सम कर सकते हो------
शिक्षा-विक्रय-केन्द्र बनाकर
पैसे लेकर ज्ञान बेचना
यह कैसा है धर्म तुम्हारा ?
दस पैसे में तुमने बेंचा
कल वह बीस में बेचेगा |
आने वाला विक्रेता तो
देश बेंचकर खा जायेगा |
ऐसे विक्रेताओं से आस नहीं तुम कर सकते हो ---
देश ,समाज के भाग्य विधाता तुम हो
तुम से देश ,देश से तुम हो |
अपनी शक्ति ,धर्म को जानो
जैसे नींव बना दोगे तुम
वैसे पुख्ता देश तुम्हारा बन जायेगा |
बनकर के चाणक्य चन्द्रगुप्त तुम्हीं देश को दे सकते हो----
ज्ञान, मान-सम्मान आज सब ऐसे बिकता
चीनी ,चावल, डाल ,तेल जैसे है बिकता
बस पैसे के खातिर शिक्षक बिकता
ऐसा करके गुरु सम मान न पा सकते हो ------
आज जगत को शिक्षक की पहिचान बता दो
दिगभ्रमित नवयुवकों को ,
तुम राह दिखा दो |
उनके अन्दर देश-प्रेम का भाव जगा दो |
ऐसा करके तुम सोये उनके भाग्य जगा सकते हो -----
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