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Sunday, February 28, 2016

मन पंछी उड़ि चलियो ,



   

मन पंछी उड़ि चलियो ,

मन पंछी उड़ि चलियो ,
जहाँ हो चैन की बगिया |

रकम-रकम के बिरवा हों जहाँ मलय पवन की छहिंया |
द्वेष –प्रेम दोउ गले मिलत हों बन जीवन की पहिया ||

राग रंग के पुष्प  खिले हों भ्रमर  भुलत जहाँ रहिया |
मस्त लुभावन मन को भावन टेरत  सुर जहाँ पपिहा ||

मधुर मनोहर पिक सुरसरिता बहती बिनु छन रुकिया |
हर दरख़्त  जहाँ झूम  झूमकर फाग  सुनावत रसिया ||

पादपपुष्प  झूमत  मस्ती से  करत  संग अठखेलियाँ |
कहत ‘आजाद’ सुनहूँ मन मेरो कर ले प्रेम की बतिया ||

कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर ‘आजाद’
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़ ,झालावाड़ (राज.)

मोबाईल- 9414750971 



Thursday, February 25, 2016

एक विचार जीवन सार

                एक विचार: जीवन सार  


कहि आजाद जब दुखित मन,माँगहु हंसी उधार |
      इससे पुनि खिल जाएगा, खुशियों का संसार ||1||

कहि आजाद न अस गिरौ, नज़र न सकौ मिलाय |
       गिरना है तो असि गिरहु, सब तोहिं लेहिं उठाय ||2||
     
चिंता की सँकरी गली ,जो कोई घुसि जाय |
      कहि आजाद बिरला कोई ,वापस फिर आ पाय ||3||
      
 अपनी सुनि तारीफ़ मैं ,फूला नहीं समाय |
      सुनि आजाद जब और की ,मुझसे रहा न जाय ||4|| 
     
मुझसे लई आपन  कहत , मोको रह्या दिखाय |
      कहि आजाद असि लोग से बचि के रहियो भाय ||5||
     
 पर सोना पीतल कहै ,निज पीतल को स्वर्ण |
      पड्यौ जौहरी सामने ,धूमिल हो गयौ वर्ण ||6|| 

कवि एवं साहित्यकार –रामचंदर आजाद
जवाहर नवोदय विद्यालय झालावाड़ (राज.)
मोबा.9982395653

       

एक विचार जीवन सार

                एक विचार: जीवन सार  


कहि आजाद जब दुखित मन,माँगहु हंसी उधार |
      इससे पुनि खिल जाएगा, खुशियों का संसार ||1||

कहि आजाद न अस गिरौ, नज़र न सकौ मिलाय |
       गिरना है तो असि गिरहु, सब तोहिं लेहिं उठाय ||2||
     
चिंता की सँकरी गली ,जो कोई घुसि जाय |
      कहि आजाद बिरला कोई ,वापस फिर आ पाय ||3||
      
 अपनी सुनि तारीफ़ मैं ,फूला नहीं समाय |
      सुनि आजाद जब और की ,मुझसे रहा न जाय ||4|| 
     
मुझसे लई आपन  कहत , मोको रह्या दिखाय |
      कहि आजाद असि लोग से बचि के रहियो भाय ||5||
     
 पर सोना पीतल कहै ,निज पीतल को स्वर्ण |
      पड्यौ जौहरी सामने ,धूमिल हो गयौ वर्ण ||6|| 

कवि एवं साहित्यकार –रामचंदर आजाद
जवाहर नवोदय विद्यालय झालावाड़ (राज.)
मोबा.9982395653




       

Sunday, February 21, 2016

चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और
जहाँ हो प्रेम की नगरी |

प्रेम धरा के कण- कण में हो नभ में  प्रेम की बदरी ||
प्रेम की भाषा  प्रेम की आशा  प्रेम सुधा  रस गगरी ||

प्रेम पियासा जन अभिलाषा मुख  में प्रेम की मिसरी ||
प्रेम विटप पर  प्रेम के पंछी  छेड़त  प्रेम की ठुमरी ||

प्रेम छवी नैनन दर्शाती  खोलत अधर प्रेम की गठरी ||
कहि ‘आजाद’ मनहिं भीतर में तेरो है प्रेम की नगरी ||


Monday, February 1, 2016

हो रहे हैं हल्के रिश्ते




हो रहे हैं हल्के रिश्ते.......




हो रहे हैं हल्के रिश्ते आजकल के जमाने में |
प्यार भी हल्का हुआ है आज आजमाने में ||
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अब तो बस प्यार में नुमाइशी चेहरे दिखते हैं |
गर्दन कटानेवाले मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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वादे और कसमों की बौछार तो करते बहुत |
उसे निभानेवाले मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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चन्द सिक्कों के लिए जान लेने पर उतारू  |
सबर करनेवाले मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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तन, मन, धन लुटानेवाले दोस्ती के नाम पर |
ऐसे दिलेर दोस्त मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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हो गयी हैं मतलबी  दिल की धड़कने शायद |
औरों के गम में धडकती अब कहाँ जमाने में ||
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सच कहें ‘आजाद’ सपने भी पराये हो गए |

सपने आँखों में हैं बसते अब कहाँ जमाने में ||