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Saturday, July 25, 2015

समाज और बाजार

समाज और बाज़ार

नेता अभिनेता चाहे मंतरी व संतरी हों ,
सभी लोग देशवा के लूट मिलि खात हैं |
सरकारी कर्मचारी बन गए व्यभिचारी ,
सरकारी कोष के लुटल आम बात है ||

चोर लूटै चोरी से डकैत सीना जोरी से ,
चोरी करने में ये न तिनकों डरात हैं |
धनपति धन द्वारा ,बलपति बल द्वारा ,
शोषण करन में लगल दिन रात हैं ||

नौकर की नौकरी में ,चाकर की चाकरी में ,
सेवा धर्म रंच मात्र ,अब न लखात हैं |
अधिकारी यदि कभी ,काम करने को कहे,
कहने पर आँख काढि और गुर्रात हैं ||

बेटी के सुहाग बिके, पत्नी औलाद बिके,
कैसे -कैसे वोट भी चुनाव में बिकात हैं |
चहुँ ओरक्रेता और विक्रेता की दुकान लगी ,
सत्य व ईमान जहाँ सस्ते बिकात हैं||

धर्म बिकै कर्म बिकै नारियों के शर्म बिकै,
मंदिरों में संत के भजन भी बिकात हैं |
आज के समाज की आज़ाद क्या बखान करूं ,
खड़े -खड़े लोगों के ज़मीर बिक जात हैं ||

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