सत्यव्रती आदमी
सत्यव्रती आदमी
काल की भुजाओं में जिन्दगी गिरफ्त है।
फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है ।
शिकवा शिकायतों की लगी हुई ढेर है ।
चारों तरफ बेसुरी बांसुरी की टेर है।
इंसानियत के पथ पर हवानियत की गस्त है ।
फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है ।
हर तरफ दहशत व आतंक का प्रसार है ।
धर्म व अधर्म में न पर्दा न दीवार है ।
हर मुल्क वर्ग ,भेद ,जातियों से त्रस्त है ।
फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है ।
निर्दोष पिस रहा है यातना की चक्कियों में ,
बेबस वह जल रहा है दुश्मनी की भट्टियों में ।
पृथ्वी को दे रहा अब आसमां शिकस्त है ।
फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है ।
अल्पवृष्टि ,अनावृष्टि कहीं अतिवृष्टि है ।
बाढ़ व भूकंप से कांपती यह सृष्टि है ।
बुत बना आदमी यह कैसा बुतपरस्त है ।
फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है ।

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