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Saturday, July 25, 2015

सत्यव्रती आदमी

सत्यव्रती आदमी

सत्यव्रती  आदमी

         काल की भुजाओं में जिन्दगी गिरफ्त है। 
             फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है । 
    
      शिकवा शिकायतों की लगी हुई ढेर है । 
चारों तरफ बेसुरी बांसुरी की टेर है। 
               इंसानियत के पथ पर हवानियत की गस्त है । 
            फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है । 

         हर तरफ दहशत व आतंक का प्रसार है । 
    धर्म व अधर्म में न पर्दा न दीवार है । 
         हर मुल्क वर्ग ,भेद ,जातियों से त्रस्त है । 
             फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है । 

            निर्दोष पिस रहा है यातना की चक्कियों में ,
             बेबस वह जल रहा है दुश्मनी की भट्टियों में । 
         पृथ्वी को दे रहा अब आसमां शिकस्त है । 
            फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है । 

          अल्पवृष्टि ,अनावृष्टि कहीं अतिवृष्टि है । 
     बाढ़ व भूकंप से कांपती यह सृष्टि है । 
        बुत बना आदमी यह कैसा बुतपरस्त है । 
             फिर भी यह सत्यव्रती आदमी अलमस्त है ।  

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