हे सखि! रूठि गये पिय मोरे |
कसिक मनाऊँ मानत नाहीं, जो कल तक थे भोरे ||
सुबह मनाऊँ, शाम मनाऊँ ,विनति करूँ कर जोरे ||
जब जब बात करन को चाहूँ , लखत न मेरी ओरे ||
जस अजनबी बात करे कोई, वैसे भये पिय मोरे ||
सब सपने अब जलत दीखते ,जो हिय रह्यौ बटोरे ||
हे 'आज़ाद' बस्यौ पिय हिय में ,तडपावत मन मोरे ||
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