कर्मवीर
जो कर्मवीर नर होता है ,
वह तनिक नहीं पछताता है |
आँधी और तूफानों में भी ,
अपने विवेक अरु भुजबल से ,
दुष्कर को कर दिखलाता है |
जीवन में आई हलचल से ,
वह तनिक नहीं घबराता है |
कर्त्तव्य मार्ग से विचलित होना ,
उसको नहीं सुहाता है |
वह मानव का परम मित्र बन ,
सब दिल पर छा जाता है |
अपने पौरष के बल पर ही ,
प्रारब्ध बदल रख देता है |
अपने अदम्य साहस से ही,
वह शत्रुंजय कहलाता है |
उसके गौरव की गाथा ,
जन-जन में गाई जाती है |
उसके कीर्ति विजय की महिमा ,
सर्वत्र सुनाई जाती है |
मातृभूमि हित प्राण गवाना ,
अपना फ़र्ज समझता है |
प्रेम संदेसा मानवता का ,
जन-जन तक पहुंचाता है |
अपने श्रम के बल पर ही ,
पर्वत में राह बनाता है |
सुखी रेती में परीश्रम से ,
स्वर्णिम पुष्प खिलाता है |
अपने श्रम के पारसमणि से ,
खुशहाली फैलाता है |
पद-मर्दित आशाओं को ,
वह हँसकर गले लगाता है |
सागर का अंतस्थल मथकर ,
वह मोती ले आता है |
विपदाओं में हँसकर जीना ,
उसके मन को भाता है |
सागर की लहरों से आगे ,
नाव लिए बढ़ जाता है |
आगे बढ़कर पीछे मुड़ना ,
उसको नहीं सुहाता है |
जीवन का इक अंग समझ ,
सुख -दुःख से हाथ मिलाता है |
उसके सम्मुख कायर जुल्मी,
नत मस्तक ही जाता है |
आगे बढ़ना बढ़ते रहना ,
के पथ को अपनाता है |
जन-जन को खुशहाली देने
का वह लक्ष्य बनाता है |

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