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Wednesday, May 20, 2020

मजबूर मजदूर

सिर पर गठरी कंधे गैंती,
कहाँ जा रहे हो राही।
सारा शहर लॉक डाउन है
तुम पर क्या विपदा आई।।

काम काज सब बंद पड़े हैं
सभी छिपे हैं अपने घर।
औद्योगिक संस्थान बन्द हैं
कहाँ चले इतने तत्पर।।

इधर न कोई नगर शहर है
इधर न कोई गाँव गिरांव।
इतनी भीषण सी गर्मी में
कहां तुम्हारा छाँव ठिकांव।।

डोर कौन सी खींच रही
जो खिंचे जा रहे हे राही।
किस मंजिल की आकांक्षा में,
भूख प्यास भूले भाई।।

कितनी दूर अभी जाना है
हे सृजन के अधिकारी।
मेहनत तो हर अंग तुम्हारे
फिर क्यों इतनी लाचारी?

रुको, रुको कुछ तो बोलो ना।
कहाँ चले के चले जा रहे।
क्या घरवाली की चिट्ठी से 
व्यथित खिंचे के खिंचे जा रहे।।

मुझे न जाना नगर शहर
और मुझे न औद्योगिक संस्थान।
कोरोना के महासमर ने
लूट लिया है मान अभिमान।।

अपने हांथों से मैंने जिस
नगर शहर को चमकाया।
उसी नगर और शहर ने मुझ पर
 भीषण कहर है बरसाया।।

जिस दुनिया के सम्मुख मैंने
हाथ नहीं फैलाये हैं।
आज उसी दुनिया ने देखो
रक्तिम अश्रु रुलाये हैं।।

कोई शहर नहीं जी सकता
बिन मजदूर के हे भाई!
भला बताओ कैसे रहें जब
बात पेट पर है आई।।

मंजिल दूर बहुत है भाई।
और नहीं कोई पथ साधन।
फिर भी जिसने राह सुझाई
उस प्रभु का शत शत अभिवादन।।

जिससे आशा मिली निराशा
सब स्वारथ के चोर।
निकल पड़ा हूँ दृढ़ इच्छा ले
अपने गाँव की ओर।।


Tuesday, May 12, 2020

वक्त-बेवक्त

बदल गया कुछ बदल रहा है अपना हिंदुस्तान रे।
मंद पड़ गई गाँव की रौनक शहर हुआ वीरान रे।।

जगह जगह पर पहरे हैं घर मे रहने को मजबूर।
चुपके चुपके घर जाने को बेबस हो गए मजदूर।।
फिर से याद आ रहे उनको खेत और खलिहान रे।।

काम धाम सब बंद हैं ऐसे , सांप सूंघ गया है जैसे।
सूखी रोटी भी नसीब से भाग रही जिएँ अब कैसे?
जिजीविषा के वशीभूत सब तज घर किया पयान रे।।

बीमारी लेकर आई संग बेकारी, भुखमरी का जाल।
रोजी रोटी छिनी जा रही लाचारी और खस्ताहाल।।
अस्त व्यस्त की पराकाष्ठा अब हरने लगी है प्रान रे।।

भारत भ्रमण फीका पड़ गया उनके कदमों के आगे।
लक्ष्य बनाकर निकल पड़े अब मौत देख उनको भागे।।
जीवन मरण से परे व्रत मन मे लिया है उसने ठान रे।।

जिनके फौलादी बाहों ने महल बनाये बढ़ चढ़कर।
आज निराश्रित वह पैदल निकल पड़ा है अपने घर।।
ताजमहल और लालकिला भी चकित और हैरान रे।।