गीत
दर्द अपने चाहते हो यदि छिपाना |
सबसे पहले सीखिए तुम मुस्कराना ||
हो गया है तो ये चेहरा पुराना ||
आपने अपने को न जाना न समझा |
बस यही कहते रहते दुश्मन ज़माना ||
दर्द आँखों में तुम्हारे दिख रहा
है |
और करते आप हँसने का बहाना ||
ज़िन्दगी तन्हाँ नहीं कट पाएगी |
दोस्त तुमको तो पड़ेगा ही बनाना ||
चाहते ‘आजाद’ तुम गम को भगाना |
गीत कोई सीखिए तुम गुनगुनाना ||
कवि एवं साहित्यकार– राम चंदर ‘आजाद’
दूरभाष-
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