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Saturday, July 25, 2015

मैं क्या करूँ

गीत : 'मैं क्या करूँ '-- "काव्य-सुमन से "

राम चन्दर 'आज़ाद '

गीत : 'मैं क्या करूँ '-- "काव्य-सुमन से "


उठ रही हैं समुन्दर में लहरें बहुत ,
                  पर किनारे न पहुंचे तो मैं क्या करूँ ?
नाव लेकर के नाविक चला था मगर ,
                  बीच में डूब जाये तो मैं क्या करूँ ?
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एक तस्वीर थी दिल के अरमान की ,
                  जिसको अपने जेहन में छिपा कर रखा ,
छुट कर हाथ से गिर पड़े वह अगर ,
                  और वह टूट जाये तो में क्या करूँ ?
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आँख में आंसुओं को रखा बंदकर ,
                   चूं पड़े न कहीं ये तुम्हे देखकर ,
डबडबाई हुई अश्रु संचित किये ,
                   गर टपकने लगीं तो मैं क्या करूँ ?
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दिल की धड़कन कहीं तेज हो जाये ना ,
                    इसलिए मोड़ मुँह को चला मैं उधर ,
उनके क़दमों की आहट को सुनकर के ही ,
                       दिल धड़कने लगा यदि तो मैं क्या करूँ ?
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