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Monday, November 30, 2015

पञ्च विचार: दोहे

पञ्च विचार: दोहे  


पने मुख मत कीजिये , अपना ही गुणगान |
कहि ‘आजाद’ इससे नहीं ,कभी बढ़त है मान ||1||
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ल में लाठी मारिये , जल  में  पड़े न फ़र्क |
ऐसहि जिद्दी लोग से , व्यर्थ  करब  है  तर्क ||2||
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सोच समझ  कर लीजिये , जीवन  में  संकल्प |
कहीं पितामह भीष्म सम,फिर नहिं बचे विकल्प ||3||
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जीव जनम के संग ही , मौत जनम  भी  लेय |
जीव संग निसि दिन फिरै, भनक न लागन देय ||4||
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नुशाशन की रोपनी , घर- परिवार  से  होय |

विद्यालय में फूल-फलि, एक बिरिछ सम होय ||5||




Sunday, November 29, 2015

जिंदगी मौत


जिन्दगी मौत -----


जिन्दगी  मौत  का  ये  सिलसिला  पुराना है ,
एक  के   आते   ही   दूसरे   को  जाना है ||
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रिश्ते  और  नातों  में  हम बंधे  हुए तो क्या ,
तोड़  इस  बंधन  को  एक  दिन तो जाना है ||
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रस्म  व  रिवाजों  को  तोड़ना बहुत  मुश्किल ,
हाल  चाहे  जैसे  हों  हरहाल  में  निभाना है ||
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एक  अहसास से  ही   दिल  धड़क  उठता है ,
फिर भी दिल की धड़कन को सीने में दबाना है ||
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उपवनों की  शोभा  तो फूल  से  ही  होती  है ,
टूटकर   डाली    से   हार    बन  जाना  है ||
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मंजिलों  को  राहों  से  दूर  कर  नहीं  सकते ,
‘आज़ाद’  राहों  से  ही  मंजिलों  को  पाना है ||









Wednesday, November 25, 2015

मेरी रचनाओं का छायाचित्र


राम चंदर 'आज़ाद'
कवि एवं साहित्यकार 
पद-  हिंदी शिक्षक 
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़,झालावाड़ (राज.)
पिन -३२६५१२








Tuesday, November 24, 2015

बात सच थी ----

बात सच थी ----


बात सच थी मगर कहने में हम सकुचाये |
ना चाहकर  भी हमने  मंद मंद  मुस्काए|| 
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उनकी   तारीफ़  हमें   थोड़ी   सी  अजीब  लगी |
जिन्हें  हम  फूटी  आँखों   भी  कभी  नहीं भाए ||
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जिसने   परवाह    नहीं   की   कभी  जमाने  की |
वो   जमाने   की    सीख    देने    मेरे    घर  आये ||
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ये  कैसी  दोस्ती  है  जिन्दगी  संग   साँसों  की |
एक   के   रूठते   फिर    दूसरी   भी   चल   जाए ||
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जिसने  जीवन  में दोस्ती  की  कदर  ना जानी |
सच  में   आजाद  दोस्ती   की  वो  कसम  खाए ||






आमिर से

         आमिर से ----
कितना आसान था कहना –
कि हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
जबकि आप में मुल्क बसता है |
हर जवान ,बूढ़े ,बच्चे
आप के दिल में बसते हैं |
टीवी के स्क्रीन पर आपको देखकर
अपना काम छोड़कर आ धमकते हैं |
‘सत्यमेव जयते’ क्या मात्र बिजनेस था –
या सच्ची घटनाओं को उजागर कर
लोकप्रियता हासिल करना |
अथवा सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों पर
कुठाराघात कर महान बनना |
बड़ी ही योग्यता एवं बहादुरी के साथ
सच को समाज के सामने परोसना
क्या एक मात्र नाटक था
अथवा यह सब एक दिखावा था |
यह देश आपसे प्यार करता है
और आप कहते हैं कि
हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
चलिए कुछ समय के लिए मान लेते हैं कि
फिल्मों में दिखावा होता है न कि हकीकत
फिर भी –
फिल्म में आपके नकली रोने पर लोग रो देते हैं
और हँसने पर खिलखिला उठते हैं |
क्या आप को अपने मुल्क से
मोहब्बत नहीं है ? है न ---
फिर कैसे कह सकते हैं कि
हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
ज़रा दिल से सोचिये –
जिसमें भारत बसता है
जब आप यहाँ महफूज नहीं हैं तो
मेरा मानना है कि दुनिया का कोई मुल्क
आपको महफूज नहीं रख सकेगा |
वतन से प्रेम है तो वतन पर
विश्वास कीजिये ---वतन के साथ चलिए –
नहीं तो वही होगा
धोबी का कुत्ता घर का न घाट का-----


Monday, November 23, 2015

धर्म प्रवचक

       धर्म प्रवचक

देश के  कोने-कोने  में  उपदेशक  की  भरमार  है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार  है ||

हर  टीवी  चैनल  पर  देखो ,बाबाओं  की  फ़ौज है |
खाने,  पीने,  सोने, बैठने  सभी  तरह से   मौज है |
धरम-करम,मोह,माया का ऐसा सबक सिखाते हैं |
भोले-भाले भक्त जनों को अपना शिष्य बनाते हैं ||

निर्बल और असहाय सह रहा फिर भी अत्याचार है ||
समझ  नहीं आता  जाने क्यों  होता नहीं सुधार  है ||

मधुर  वचन  में  कथा-वार्ता  सबको रोज सुनाते हैं |
बाबाओं से  मिलने  खातिर  टिकट  ख़रीदे जाते हैं |
कोई तीसरा हाथ  बताकर  जनता  को  भरमाते हैं |
टोने-टोटके  भांति-भांति के वे  करतब  बतलाते हैं ||

तब भी नहीं रोकते रुकता  फ़ैल रहा  व्यभिचार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार  है ||

कोई   कंठहार   बेंचता , कोई   मूर्ति  का  व्यापारी |
जिसके धारण कर लेने से मिट जाती दुविधा सारी |
जनम कुंडली की पुस्तक का कोई बना है व्यापारी |
अपने-अपने भाग्य  बनाने में  अंधी  दुनिया  सारी ||

मोबाईल कंप्यूटर  टीवी पर  इनका खूब  प्रचार है ||
समझ नहीं आता जाने क्यों  होता नहीं  सुधार  है ||

धर्मगुरु तो सभी धरम के एक कम  सौ के फेर में |
आज चढ़ावे कितने चढ़ गए पड़े  हुए इस  फेर में |
माया मोह के उपदेशक ही माया  मोह के  फेर में |
ऐसे धर्म के पथप्रदर्शक ही खुद फँस रहे अंधेर में ||

ऐसे जन से  भले  की  आशा  करना ही  बेकार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार  है || 


         

Sunday, November 22, 2015

सत्ताईस नक्षत्र

         
सत्ताईस नक्षत्र 

होवत सत्ताईस नक्षत्र  हिंदी  के  प्रतिमास |
कृतिका  रोहिणी मृगशिरा हर कोई है ख़ास || 
हर कोई है ख़ास आर्द्रा  पुनर्वसु  अरु  पुष्य | 
अश्लेषा मघा की  बरखा  भावै  सबही  मनुष्य || 
कहता है 'आज़ाद' पूर्वाफाल्गुनी कितनी मस्त |
झूमत उत्तराफाल्गुनी संग जब  आवत हस्त  || 

चित्रा  ने चित ले  लियौ  चातक  भयौ उदास |
चातक को अब स्वाति  से बची है थोड़ी आस ||
बची है थोड़ी  आस विशाखा  नहिं   अनुराधा  |
ज्येष्ठा मूल  से  चातक को बस मिलेगी बाँधा || 
कहता    है  'आज़ाद'    आ  गयौ    पूर्वाषाढा  |
वाके   पीछे  आ  धमक्यो  तब   उत्तराषाढ़ा  ||

श्रवण  फुहारन  संग में अंतर्मन  गयो  भीज |
गोरी   गीत   सुनावती  सावन  आयौ  तीज ||
सावन आयौ तीज धनिष्ठा अरु  शतामिषा  |
त्याग  पूर्वाभाद्रपद  दीजिये  मन  से  इर्ष्या  ||
कहता है 'आज़ाद' उत्तराभाद्रपद  की कथनी |
                            कहत रेवती अश्विनी  जस करनी वस् भरणी  ||





Saturday, November 21, 2015

शाश्वत जीवन


शाश्वत जीवन 

जीवन में कुछ मिल जाए या जीवन से कुछ छीन जाए |
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
वह देखो गिर रहीं पत्तियाँ टूट टूट कर पेड़ों से ,
नंगा पेड़ झुलस रहा है लू के गरम थपेड़ों से |
पतझड़ से जंगल नहीं वीरान हुआ करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

नदियाँ शाश्वत बहती रहतीं ,थकती नहीं कभी भी वे |
कल कल करती रहतीं ,रूकती नहीं कभी भी वे ||
उनका प्रबल वेग तो चट्टानों को मोड़ दिया करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

रोज रोज दाह से पीड़ित ,फिर भी मना नहीं कर सकता |
धूम्र रूप में आहें तजकर .शांत उसे होना है पड़ता |
फिर भी वह श्मशान देखिये ,कभी नहीं रोया करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

बादल उसे भले ही ढँक ले ,कुहरा चाहे चमक रोक ले |
शीत उसे ठिठुरन पैदा कर ,उसके ताप भले कम कर दे |
फिर भी रवि के उदय अस्त पर फर्क नहीं पड़ा करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

लाख लांछन आरोपित हों ,वह उनकी परवाह न करता |
अपने सत्कर्मो के बल पर , वह प्रतिपल आगे को बढ़ता |
वह सत्पथ पर चलने से, कभी नहीं डरा करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||



Wednesday, November 4, 2015

कर्म की राह


        कर्म की राह 

पूजा मेरा कर्म नहीं है ,कर्म ही मेरी पूजा है |
               सच कहता हूँ इससे बढ़कर और नहीं दूजा है |
इसी के बल पर मैंने अपना नाम कमाया है |
            मेरे जीवन का चिराग बन इसने राह दिखाया है ||


यही तो गांधी की लाठी बन सबके सम्मुख आया था |
            यह सुभाष का साथी बन जर्मनी घूम कर आया था |
दलित मसीहा को इसने ही रस्ता नया दिखाया था |
            नेहरु का यह रूप ग्रहण कर बच्चों के मन भाया था ||

बलिदानी झाँसी-रानी संग रण में धूम मचाया था |
           हरिश्चंद को इसने ही सत्पथ का राह दिखाया था ||
इसी के कारण राघव ने बनवास सहर्ष निभाया था |
           भगत इसी से प्रेरित हो फाँसी को गले लगाया था ||
शेरे दिल आजाद ने  अंग्रेजों को खूब छकाया  था ||

मैं भी उसी कर्म के पथ पर निकल पड़ा हूँ |
             जिससे मैंने कुछ पल को विश्राम लिया था |
वह चिरपरचित  राहें जिससे गहरा रिश्ता है |
             जिसको मैंने जीवन का इक नाम दिया था ||

वही कर्म की डोर खींचती है अब मुझको |
             जिससे प्रेम से बटकर के अंजाम दिया था |
उसी डगर पर आज जरुरत है चलने की |
             जिससे देश प्रगति के पथ पर पुनः बढ़ सके ||






Tuesday, November 3, 2015

महँगाई


          महँगाई
चूल्हे चौके चुप पड़े हैं ,
          चुप पड़ी कोने पतीली |
हाय रे ! महँगाई तूने,
          जेब कर दी सबकी ढीली ||
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प्यार बसता था कभी,
          जो आँखे थी काली व पीली |
इक झलक जब आज देखा ,
           हो रहीं थी लाल पीली ||
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सब्जियाँ कुछ सूखी बनती ,
          और कुछ बनती रसीली |
जो कभी थी सूखी थी बनती ,
           हो गयी वो भी रसीली ||
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पेट तो सूखा पड़ा है ,
           आँख से बहता है पानी |
आंसुओं को पोंछने से ,
           हो गयी है बाहें गीली ||
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सबकी मुँहबोली बनी है ,
           हाय! महँगाई छबीली |
शर्ट तो पहले थी ढीली ,
           कर गयी पतलून ढीली ||
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दिख रहे बाज़ार सूने ,
           और दुकाने सो रही हैं |
देखिये इसने तो कर दी ,
           हर किसी की बन्द बोली ||
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कौन समझाए इसे ,
          है नहीं सुनती किसी की |
क्या कहें 'आज़ाद' यह ,
          है बहुत जिद्दी व हठीली ||
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Monday, November 2, 2015

जाके मन को खेती भावै



जाके मन को खेती भावै |



जाके मन को खेती भावै |

सुमित कुदार, ज्ञान कि गैंती, बंजर  खोदि  बहावै ||

प्रगति  बीज ,खेत  मंह  डाले,  अंकुर  स्नेह उगावै ||

प्रेम नीर  से  करे  सिंचाई , तन  सम  खेत  बनावै ||

बाल पौध को रोजहि निरखत, तृण को नोच बहावै ||

बरसा ,धुप ,ठण्ड को रोकत , तनिक न धैर्य गंवावै||

कहि 'आजाद' संत की किरपा, देखि फसल हरसावै ||





Sunday, November 1, 2015

दिल में बसा लिया है




दिल में बसा लिया है------- 


दिल में बसा लिया है तो फिर साथ दीजिये |
यदि  ऐसा  नहीं  है  तो  हमें  माफ़ कीजिये ||
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माना की मुझसे आपको नहीं कोई सरोकार ,
फिर  भी तो  गैर  जैसे  न  बरताव  कीजिये ||
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यह प्यार  खिलौना  नहीं जो खेले चल दिए ,
रखकर के  दिल पे  हाथ  ज़रा गौर कीजिए ||
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दिल तोड़कर के तुझको मिलेगा नहीं सुकून ,
आखिर तू अपने दिल से ये सवाल कीजिये ||
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टूटे  हुए  रिश्ते  बड़ी  मुश्किल  से  हैं  जुड़ते ,
बीते  हुए  लम्हों  को  फिर  से याद कीजिये ||
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बहके  हुए  कदमों को रोकना नहीं मुश्किल ,
'आजाद'  एक  बार  फिर  से  पहल कीजिये ||
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