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Saturday, July 25, 2015

अम्बेडकरी कवच

अम्बेडकरी कवच

संविधान में संशोधन की बाढ़ आ गई |
        अनुच्छेद और धाराएँ सब तैर रही हैं |
             जाति धर्म की व्यापक लहरें उमड़ रही हैं |
                   लूट मची है नियमावली और अनुसूची की ,

नेताओं को नहीं फिक्र इस महाप्रलय से
         उनको तो बस जनमत और पद की अभिलाषा |
                अपनी कुर्सी सदा सलामत रहनी चहिये,
                      चाहे डूबे राष्ट्र या चाहे डूबे भाषा |


जाति धर्म और वर्ग-भेद की नौका लेकर,
         आरक्षण का लोभ दिखाकर जनमानस को ,
                 आरक्षण में आरक्षण का लालच देकर
                         मची खलबली आरक्षण के भीषण तट पर|

दलित समाज अभी सर उठा नहीं पाया है |
        जाति धर्म और छुआछूत अब भी उसके संग ,
              चंद जनों को प्रगति पंथ पर देख-देखकर ,
                     मानो औरों के हद सिमट हो गए तंग |

अम्बेडकरी कवच दलितों का एक सहारा ,
       डूब रहा संवि-संशोधन के महाप्रलय में |
             कर्ण कवच छीना था जैसे इन्द्रराज ने ,
                  दलित कवच भी छिना जा रहा संशोधन में |

आज एक अम्बेडकर की हो रही ज़रूरत,
         धाराओं को नई दिशा में मोड़ सके जो |
               दलित शोषितों के अधिकारों की नौका को ,
                     किसी सुरक्षित तट पर फिर से लगा सके जो |

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