अम्बेडकरी कवच
संविधान में संशोधन की बाढ़ आ गई |
अनुच्छेद और धाराएँ सब तैर रही हैं |
जाति धर्म की व्यापक लहरें उमड़ रही हैं |
लूट मची है नियमावली और अनुसूची की ,
अनुच्छेद और धाराएँ सब तैर रही हैं |
जाति धर्म की व्यापक लहरें उमड़ रही हैं |
लूट मची है नियमावली और अनुसूची की ,
नेताओं को नहीं फिक्र इस महाप्रलय से
उनको तो बस जनमत और पद की अभिलाषा |
अपनी कुर्सी सदा सलामत रहनी चहिये,
चाहे डूबे राष्ट्र या चाहे डूबे भाषा |
जाति धर्म और वर्ग-भेद की नौका लेकर,
आरक्षण का लोभ दिखाकर जनमानस को ,
आरक्षण में आरक्षण का लालच देकर
मची खलबली आरक्षण के भीषण तट पर|
आरक्षण का लोभ दिखाकर जनमानस को ,
आरक्षण में आरक्षण का लालच देकर
मची खलबली आरक्षण के भीषण तट पर|
दलित समाज अभी सर उठा नहीं पाया है |
जाति धर्म और छुआछूत अब भी उसके संग ,
चंद जनों को प्रगति पंथ पर देख-देखकर ,
मानो औरों के हद सिमट हो गए तंग |
जाति धर्म और छुआछूत अब भी उसके संग ,
चंद जनों को प्रगति पंथ पर देख-देखकर ,
मानो औरों के हद सिमट हो गए तंग |
अम्बेडकरी कवच दलितों का एक सहारा ,
डूब रहा संवि-संशोधन के महाप्रलय में |
कर्ण कवच छीना था जैसे इन्द्रराज ने ,
दलित कवच भी छिना जा रहा संशोधन में |
डूब रहा संवि-संशोधन के महाप्रलय में |
कर्ण कवच छीना था जैसे इन्द्रराज ने ,
दलित कवच भी छिना जा रहा संशोधन में |
आज एक अम्बेडकर की हो रही ज़रूरत,
धाराओं को नई दिशा में मोड़ सके जो |
दलित शोषितों के अधिकारों की नौका को ,
किसी सुरक्षित तट पर फिर से लगा सके जो |
धाराओं को नई दिशा में मोड़ सके जो |
दलित शोषितों के अधिकारों की नौका को ,
किसी सुरक्षित तट पर फिर से लगा सके जो |
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