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Tuesday, December 1, 2015

हम कैसे भूल----


            हम कैसे भूल----

हम कैसे भूल  सकते उन्हें  देश के लिए |
थे  बेगुनाह फिर भी  मरे देश  के लिए ||

जिनका न किसी से कोई झगड़ा न लड़ाई,
फिर भी हुए कुर्बान  अपने देश  के लिए ||

मज़हब के सियासी रगों से थे जो बेखबर,
मज़हब के वे शिकार  बने देश  के लिए ||

आतंक से जिनका ना दूर दूर का रिश्ता,
वे आह के भी घूँट पिए देश के लिए ||

बसता था दिल में जिनके देश का गौरव,
वे सो गए सदा सदा इस देश के लिए ||

इतिहास तो नहीं बने वे देश के खातिर ,
पर हर जुबाँ ने शोक कहा देश के लिए ||

‘आज़ाद’ इस जमीं पे जो आया है जाएगा,
मरके भी प्यार कम न हुआ देश के लिए ||





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