हम कैसे भूल----
हम कैसे भूल सकते उन्हें देश के लिए |
थे बेगुनाह
फिर भी मरे देश के लिए ||
फिर भी हुए कुर्बान अपने देश के लिए ||
मज़हब के सियासी रगों से थे जो बेखबर,
मज़हब के वे शिकार बने देश के लिए ||
आतंक से जिनका ना दूर दूर का रिश्ता,
वे आह के भी घूँट पिए देश के लिए ||
बसता था दिल में जिनके देश का गौरव,
वे सो गए सदा सदा इस देश के लिए ||
इतिहास तो नहीं बने वे देश के खातिर ,
पर हर जुबाँ ने शोक कहा देश के लिए ||
‘आज़ाद’ इस जमीं पे जो आया है जाएगा,


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