कब तक सच के मारे----
कब तक सच के मारे मारे फिरते रहेंगे |
आओ मिलकर फिर से नव निर्माण करें||
जाति,धर्म के बोझ को कब तक हम ढोयेंगे|
इसे छोड़
मानवता के हित कार्य करें ||
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झूठी शान के हम लिबास कब तक पहनेंगे |
इसे उतार नए
युग की शुरुआत
करें ||
रूढ़िवादिता की परिपाटी से चिपके हम ,
सकल विश्व
के जनगण मन का मान करें ||
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हम अपने को क्यों आँके परमाणु शक्ति से ,
करना है तो इससे जन
कल्याण करें |
इसके विध्वंसक रूपों से खुद को बचाएं ,
क्यों
इससे हम धन जन का नुकसान करें ||
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हम दूजों को नीचा दिखलाने के खातिर ,
रोज रोज क्यों
नयी घिनौनी चाल चलें |
अच्छे करतब की राहों के अनुयायी बन ,
ऊँचा बनना है
तो ऊँचे काम करें ||
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समरसता के बीज दिलों में तब उपजेंगे ,
जब हम
उनके दिलों में अपनी जगह करें |
छल धोखे का मार्ग बड़ा ही दुखकर है ,
इसे छोड़ हम सबके दिल पर फतह करें ||
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नहीं कभी आतंक क्रूरता जीत सकेंगे ,
चाहे लाखों यत्न और
प्रयास
करें |
सदा सदा से वे मुँह की खाते आयें हैं ,
इसीलिए हम क्यों उन पर विश्वास करें ||
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जिस मिट्टी में हमने खेलें हैं बचपन में ,
उस
मिट्टी पर गर्व और अभिमान करें |
ऐसी मिट्टी के खातिर कुछ भी हो जाए ,

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