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Saturday, December 5, 2015

कब तक सच के मारे----


कब तक सच के मारे----


कब तक सच के मारे मारे फिरते रहेंगे |
     आओ मिलकर फिर से नव निर्माण करें||
जाति,धर्म के बोझ को कब तक हम ढोयेंगे|
     इसे  छोड़  मानवता के हित कार्य करें ||
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झूठी शान के हम लिबास कब तक पहनेंगे |
     इसे  उतार  नए  युग  की  शुरुआत करें ||
रूढ़िवादिता की परिपाटी से चिपके हम ,
     सकल विश्व के जनगण मन का मान करें ||
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हम अपने को क्यों आँके परमाणु शक्ति से ,
     करना  है  तो  इससे  जन  कल्याण करें |
इसके विध्वंसक रूपों से खुद को बचाएं ,
     क्यों इससे हम धन जन का नुकसान करें ||
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हम दूजों को नीचा दिखलाने के खातिर ,
     रोज  रोज  क्यों  नयी घिनौनी चाल चलें |
अच्छे करतब की राहों के अनुयायी बन ,
     ऊँचा  बनना  है  तो  ऊँचे  काम  करें ||
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समरसता के बीज दिलों में तब उपजेंगे ,
     जब हम उनके दिलों में अपनी जगह करें |
छल धोखे का मार्ग बड़ा ही दुखकर है ,
     इसे  छोड़ हम सबके दिल पर फतह करें ||
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नहीं कभी आतंक क्रूरता जीत सकेंगे ,
     चाहे  लाखों   यत्न  और   प्रयास  करें |
सदा सदा से वे मुँह की खाते आयें हैं ,
     इसीलिए  हम क्यों उन पर विश्वास करें ||
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जिस मिट्टी में हमने खेलें हैं बचपन में ,
      उस मिट्टी  पर गर्व और अभिमान करें |
ऐसी मिट्टी के खातिर कुछ भी हो जाए ,
      प्राणार्पित कर हम उसका सम्मान करें ||



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