आज़ाद के दोहे -
मैं अपने को मानता , सबसे बड़ा चलाक |
पर जब देखा आपको , मैं रह गया अवाक ||1||
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कहि 'अजाद' मन साफ़ हो , का करि सकत कलंक |कमल सदा ही खिलत है ,नीर होहिं या पंक ||2||
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निरखत निरखत और को , भयौ सुबह से शाम |
अपने को निरखा नहीं , बीत्यौ उमर तमाम ||3||
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कहि 'अजाद' जब आपने , गिरवी रखी ज़मीर |
फिर यह कहि क्यों झंखते , फूट गई तकदीर ||4||
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प्रेम खिलै नफ़रत मिटे , दिल में उठे हुलास |
कहि 'अजाद' जब नहिं रहै, कोई आस निरास ||5||
'आज़ाद सतसई' से -
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