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Tuesday, December 8, 2015

मौक़ापरस्त


जिसे देखो वही यहाँ पर ,
        कुछ न कुछ भुनाने  में लगा है |
कोई यश तो कोई पैसा तो ,
       कोई कोई हंसाने में लगा है |
अजी मामला यहीं नहीं थमता ,
        कोई-2 तो पहचान बनाने में लगा है ||

उलटे-सीधे बयानबाजी करके ,
          कोई तो जनप्रिय हो जाने में लगा है |
यह भी एक जीवन का सच है |
        कोई कोई किस्मत आजमाने में लगा है |
ना जाने क्यों कुछ समझ में नहीं आता ,
        इसीलिए कोई कोई मुझे समझाने में लगा है ||

दीवार ऊँची है ,चिकनी है फिर भी,
        कोई कोई छलांग लगाने में लगा है|
ये कैसा वक्त है ,आदमी स्वयं में मस्त है |
         हर कोई अपनी धुन सुनाने में लगा है |
कुछ सुनकर अनसुने कर देते हैं |
         ऐसे अन्सुनों को भी सुनाने में लगा है ||

अजीब रिश्ता है सांस का जीवन से ,
         जो शाश्वत निभाने में लगा है |
दर्द के लिए दवा तो है मगर ,
          फिर भी बेदर्द रूलाने में लगा है |
प्रीति की डोर टूट न जाए कहीं ,
            इसीलए वह आँसू बहाने में लगा है ||

ऊँचे-ऊँचे मकान हैं सड़कों के किनारे ,
          जिसे आदमी रंग-रोगन से सजाने में लगा है |
जो कल तक खँडहर था वीरान था ,
        आज वह मानव स्पर्श से जगमगाने लगा है |
सच कहा है किसी ने कभी घूरे के दिन भी लौटेंगे |
        आज के वक्त में आदमी उसे पहचानने लगा है ||








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