मैं परदेशी यह देश न भावै |
मैं परदेशी यह देश न भावै |
अपना अपना जेहि को समझा वो मारन को धावै ||
हँसना चलना जेहि सिखायौ वहि अब मोहि रुलावै ||
स्वारथ बस सब आपन बोलत फेरि न सम्मुख आवै ||
प्रेम फाँस निकसै नहिं देवै उलझि- उलझि रहि जावै ||
माया मोह ने ऐसो बाँध्यौ कछू समुझि नहिं आवै ||
कहि ‘आजाद’ रूठ्यौ परदेशी अपन देश को सिधावै ||

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