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Monday, November 23, 2015

धर्म प्रवचक

       धर्म प्रवचक

देश के  कोने-कोने  में  उपदेशक  की  भरमार  है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार  है ||

हर  टीवी  चैनल  पर  देखो ,बाबाओं  की  फ़ौज है |
खाने,  पीने,  सोने, बैठने  सभी  तरह से   मौज है |
धरम-करम,मोह,माया का ऐसा सबक सिखाते हैं |
भोले-भाले भक्त जनों को अपना शिष्य बनाते हैं ||

निर्बल और असहाय सह रहा फिर भी अत्याचार है ||
समझ  नहीं आता  जाने क्यों  होता नहीं सुधार  है ||

मधुर  वचन  में  कथा-वार्ता  सबको रोज सुनाते हैं |
बाबाओं से  मिलने  खातिर  टिकट  ख़रीदे जाते हैं |
कोई तीसरा हाथ  बताकर  जनता  को  भरमाते हैं |
टोने-टोटके  भांति-भांति के वे  करतब  बतलाते हैं ||

तब भी नहीं रोकते रुकता  फ़ैल रहा  व्यभिचार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार  है ||

कोई   कंठहार   बेंचता , कोई   मूर्ति  का  व्यापारी |
जिसके धारण कर लेने से मिट जाती दुविधा सारी |
जनम कुंडली की पुस्तक का कोई बना है व्यापारी |
अपने-अपने भाग्य  बनाने में  अंधी  दुनिया  सारी ||

मोबाईल कंप्यूटर  टीवी पर  इनका खूब  प्रचार है ||
समझ नहीं आता जाने क्यों  होता नहीं  सुधार  है ||

धर्मगुरु तो सभी धरम के एक कम  सौ के फेर में |
आज चढ़ावे कितने चढ़ गए पड़े  हुए इस  फेर में |
माया मोह के उपदेशक ही माया  मोह के  फेर में |
ऐसे धर्म के पथप्रदर्शक ही खुद फँस रहे अंधेर में ||

ऐसे जन से  भले  की  आशा  करना ही  बेकार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार  है || 


         

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