धर्म प्रवचक
देश के कोने-कोने में उपदेशक की भरमार है |
हर टीवी चैनल पर देखो ,बाबाओं की फ़ौज है |
खाने, पीने, सोने, बैठने सभी तरह से मौज है |
धरम-करम,मोह,माया का ऐसा सबक सिखाते हैं |
भोले-भाले भक्त जनों को अपना शिष्य बनाते हैं ||
भोले-भाले भक्त जनों को अपना शिष्य बनाते हैं ||
निर्बल और असहाय सह रहा फिर भी अत्याचार है ||
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||
मधुर वचन में कथा-वार्ता सबको रोज सुनाते हैं |
बाबाओं से मिलने खातिर टिकट ख़रीदे जाते हैं |
कोई तीसरा हाथ बताकर जनता को भरमाते हैं |
टोने-टोटके भांति-भांति के वे करतब बतलाते हैं ||
तब भी नहीं रोकते रुकता फ़ैल रहा व्यभिचार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||
कोई कंठहार बेंचता , कोई मूर्ति का व्यापारी |
जिसके धारण कर लेने से मिट जाती दुविधा सारी |
जनम कुंडली की पुस्तक का कोई बना है व्यापारी |
अपने-अपने भाग्य बनाने में अंधी दुनिया सारी ||
मोबाईल कंप्यूटर टीवी पर इनका खूब प्रचार है ||
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||
धर्मगुरु तो सभी धरम के एक कम सौ के फेर में |
आज चढ़ावे कितने चढ़ गए पड़े हुए इस फेर में |
माया मोह के उपदेशक ही माया मोह के फेर में |
ऐसे धर्म के पथप्रदर्शक ही खुद फँस रहे अंधेर में ||
ऐसे जन से भले की आशा करना ही बेकार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||


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