जाके मन को खेती भावै |
जाके मन को खेती भावै |
सुमित कुदार, ज्ञान कि गैंती, बंजर खोदि बहावै ||
प्रगति बीज ,खेत मंह डाले, अंकुर स्नेह उगावै ||
प्रेम नीर से करे सिंचाई , तन सम खेत बनावै ||
बाल पौध को रोजहि निरखत, तृण को नोच बहावै ||
बरसा ,धुप ,ठण्ड को रोकत , तनिक न धैर्य गंवावै||
कहि 'आजाद' संत की किरपा, देखि फसल हरसावै ||
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