Followers

Wednesday, November 4, 2015

कर्म की राह


        कर्म की राह 

पूजा मेरा कर्म नहीं है ,कर्म ही मेरी पूजा है |
               सच कहता हूँ इससे बढ़कर और नहीं दूजा है |
इसी के बल पर मैंने अपना नाम कमाया है |
            मेरे जीवन का चिराग बन इसने राह दिखाया है ||


यही तो गांधी की लाठी बन सबके सम्मुख आया था |
            यह सुभाष का साथी बन जर्मनी घूम कर आया था |
दलित मसीहा को इसने ही रस्ता नया दिखाया था |
            नेहरु का यह रूप ग्रहण कर बच्चों के मन भाया था ||

बलिदानी झाँसी-रानी संग रण में धूम मचाया था |
           हरिश्चंद को इसने ही सत्पथ का राह दिखाया था ||
इसी के कारण राघव ने बनवास सहर्ष निभाया था |
           भगत इसी से प्रेरित हो फाँसी को गले लगाया था ||
शेरे दिल आजाद ने  अंग्रेजों को खूब छकाया  था ||

मैं भी उसी कर्म के पथ पर निकल पड़ा हूँ |
             जिससे मैंने कुछ पल को विश्राम लिया था |
वह चिरपरचित  राहें जिससे गहरा रिश्ता है |
             जिसको मैंने जीवन का इक नाम दिया था ||

वही कर्म की डोर खींचती है अब मुझको |
             जिससे प्रेम से बटकर के अंजाम दिया था |
उसी डगर पर आज जरुरत है चलने की |
             जिससे देश प्रगति के पथ पर पुनः बढ़ सके ||






No comments: