महँगाई
चूल्हे चौके चुप पड़े हैं ,
हाय रे ! महँगाई तूने,
जेब कर दी सबकी ढीली ||
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प्यार बसता था कभी,
जो आँखे थी काली व पीली |
इक झलक जब आज देखा ,
हो रहीं थी लाल पीली ||
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सब्जियाँ कुछ सूखी बनती ,
और कुछ बनती रसीली |
जो कभी थी सूखी थी बनती ,
हो गयी वो भी रसीली ||
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पेट तो सूखा पड़ा है ,
आँख से बहता है पानी |
आंसुओं को पोंछने से ,
हो गयी है बाहें गीली ||
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सबकी मुँहबोली बनी है ,
हाय! महँगाई छबीली |
शर्ट तो पहले थी ढीली ,
कर गयी पतलून ढीली ||
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दिख रहे बाज़ार सूने ,
और दुकाने सो रही हैं |
देखिये इसने तो कर दी ,
हर किसी की बन्द बोली ||
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कौन समझाए इसे ,
है नहीं सुनती किसी की |
क्या कहें 'आज़ाद' यह ,
है बहुत जिद्दी व हठीली ||
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