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Saturday, January 9, 2016

आखिर कब तक

आखिर कब तक.........

कब तलक रोती रहेंगी सरहदें  आखिर हमारी |
अब तो इसके वास्ते  इंतजाम  होना चाहिए ||
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अब तो दुश्मन में नहीं शायद बची इंसानियत,
उसके माफिक अब  कोई पैगाम होना चाहिए ||
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कब  तलक  रोएँगी माँएं  और बहने, बेटियाँ ,
कोई  पुख्ता इसका  एहतमाल  होना चाहिए ||
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कब तलक खोते रहेंगे अपने नौजवानों को हम,
इस की  चर्चा अब तो  सरेआम होना चाहिए ||
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शर्म आती है नहीं उन्हें अपने धूर्त कारनामों पर,
अब तो सच ‘आज़ाद’ कोई कुहराम होना चाहिए || 


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