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Wednesday, January 20, 2016

सखि, मन मेरो स्थिर नाहीं |


सखि, मन मेरो स्थिर.........


सखि, मन मेरो स्थिर नाहीं |
पिया  प्रेम में  भयौ दिवानो, बसत है उनकी ठाहीं |
भ्रमर रूप धरि चहुँदिश भटकत,पास टिकट है नाहीं |

सोचि-सोचि कर कबहूँ हँसूं तो छन उदास होई जाहीं |
नैननि सो भयौ नींद नदारद मन कछु समझत नाहीं |

बिसरावन की लाख जुगति करि सपनन परत दिखाहीं |
मन ‘आजाद’ पिया के बस में करी सकती कछु नाहीं ||

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