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Saturday, January 23, 2016

क्रांति की ज़रूरत



    

क्रांति की जरुरत 





एक क्रांति तो  पहले हुई थी गोरों को  मार भागने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

चले गए अँग्रेज मगर  अंग्रेजीपन को  छोड़ गए |
शासन प्रशासन में अपने पुतले वंशज छोड़ गए |
वैसी  भाषा  वैसी बानी  खानपान भी  वैसा है |
लूटपाट का  वही तरीका  अकड़ फिरंगी जैसा है ||

इनको  कोई कुछ  कह दे तो  आदत इनकी गुर्राने की |  
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

रोज  शहीद  हुआ करते  हैं  सैनिक  सीमाओं पर ,
फिर भी दिल्ली क्यों चुप दिखती ऐसी घटनाओं पर ?
बस केवल दो चार दिवस अफ़सोस जताया जाता है |
उनकी वीर कथाओं का  गुणगान  सुनाया जाता है ||

भाषण- भूषण दौड़ा- दौड़ी जनता  को बस दिखलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

आज तिरंगा जाने क्यों मायूस  दिखाई पड़ता है ?
राष्ट्रगान में शौर्य नहीं अब शोर सुनाई पड़ता है |
लोकतंत्र की अरथी उठती मगर किसे परवाह है |
अपनी कुरसी रहे सलामत नहीं और कुछ चाह है ||

रोज- रोज वादे  करते जनता  को फिर से फुसलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

भ्रष्ट्राचार और अनाचार से धरा हो  गई है  बोझिल |
प्रेम और सौहार्द्र से सूखे सभ्य जनों के दिखते दिल |
इज्ज़त बे-इज्ज़त होने में कोई समय नहीं लगता है |
अपराधी सीना ताने अब  कानून  को गाली देता है ||

क्या यही था भारत का सपना जिस पर मर मिटजाने की ?
एक क्रांति  की आज जरुरत जनगण  मन को जगाने की ||










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