![]() |
क्रांति की जरुरत
एक क्रांति तो पहले हुई थी गोरों को मार भागने की |
एक क्रांति की
आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||
चले गए अँग्रेज मगर अंग्रेजीपन को छोड़ गए |
शासन प्रशासन में अपने पुतले वंशज छोड़ गए |
वैसी भाषा वैसी बानी खानपान भी वैसा है |
लूटपाट का वही तरीका अकड़ फिरंगी जैसा है ||
इनको
कोई कुछ कह दे तो आदत इनकी गुर्राने की |
एक क्रांति की
आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||
रोज शहीद हुआ
करते हैं सैनिक सीमाओं पर ,
फिर भी दिल्ली क्यों चुप दिखती ऐसी घटनाओं पर ?
बस केवल दो चार दिवस अफ़सोस जताया जाता है |
उनकी वीर कथाओं का गुणगान सुनाया जाता है ||
भाषण- भूषण दौड़ा- दौड़ी जनता को बस दिखलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||
आज तिरंगा जाने क्यों मायूस दिखाई पड़ता है ?
राष्ट्रगान में शौर्य नहीं अब शोर सुनाई पड़ता है |
लोकतंत्र की अरथी उठती मगर किसे परवाह है |
अपनी कुरसी रहे सलामत नहीं और कुछ चाह है ||
रोज- रोज वादे
करते जनता को फिर से फुसलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||
भ्रष्ट्राचार और अनाचार से धरा हो गई है बोझिल |
प्रेम और सौहार्द्र से सूखे सभ्य जनों के दिखते दिल |
इज्ज़त बे-इज्ज़त होने में कोई समय नहीं लगता है |
अपराधी सीना ताने अब कानून को गाली देता है ||
क्या यही था भारत का सपना जिस पर मर मिटजाने की ?


No comments:
Post a Comment