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Thursday, October 1, 2015

मुखौटे वाले


मुखौटेवाले 

इस ज़माने में लोग कितने मुखौटेवाले,
बदल के रोज मुखौटे निकलते देखा है ||

कभी इंसानियत के रंग की चादर ओढ़े ,
भरी महफ़िल में शान से मचलते देखा है ||

अनगिनत हसरतें दिल में समेटे वे अपने ,
नज़र में कातिलाना शाम ढलते देखा है ||

गुरूर उनको है अपने  ज़मीर पर इतना ,
न जाने कितनी बार जिसको बिकते देखा है ||

चन्द मुस्कराहटों से खुशनसीब लगते हैं ,
असलियत आँख से आँसू झलकते देखा है ||

अपनी अह्सानियत का रोब जताते फिरते ,
गैरों की नज़रों में 'आज़ाद 'गिरते देखा है || 

                


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