आज़ाद के चौकड़े
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गुरु से कपट ,मातु-पितु चोरी ,
अरु ऊपर
से सीना जोरी |नहिं आजाद पावहिं जग ठौर ,
चाहे छोरा
या हो छोरी
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गुरु से ज्ञान ,मातु से ममता ,
अरु भाई से भुजबल क्षमता |
कहि 'आजाद' पितु से निर्भयता ,
पत्नी
से सृजन की क्षमता ||
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मन से बैर उपरि से खैर ,
वा से बढ़िया समझहु गैर |
कहि 'आजाद' निश्छल मोहिं भावै,
चाहे आपुन या हो गैर ||
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धन बिनु धनी ,ज्ञान बिनु ज्ञानी ,
जस चमकत मटकी बिनु पानी |
कहि 'आजाद' ऐसहि जन जग में ,
जानि
बूझि करते नादानी
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सूरज दिवस ,चन्द्र से रजनी ,
जीवन
खेल चले नित धरनी |
कहि 'आजाद' जो होहि महाजन ,
फरक
न उनके कथनी करनी ||
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