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Tuesday, October 27, 2015

यह कैसा अभिशाप है


यह कैसा अभिशाप है ?

लता है हर साल ये रावण |
मरता नहीं कभी ये रावण |
अग्निदेव भी हतप्रभ दिखते,
असर न करता ताप है |
यह कैसा अभिशाप है ?
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आती है हर साल दीवाली ,
हर दिल में लेकर खुशहाली | 
फिर भी रोज सुनाई पड़ता ,
सीता का करुण विलाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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जलती है प्रतिवर्ष होलिका ,
रंगों में प्रतिबिम्ब होलिका |
अमर गीत फागुन है गाता ,
मस्ती का आलाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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सच्चाई के पीछे छिपकर ,
झूठ सदा चलता आया है |
हलचल -सा जो श्रवनित होता ,
उसका है पदचाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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पुष्प सदा उपवन में ही खिलेगा |
न्याय अदालत में ही मिलेगा |
यारों ! सच के निर्धारण का ,
यह कैसा परिमाप है ?
यह कैसा अभिशाप है ?
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उपदेशों का बाजारों गरम है |
पैसा -पूजा ,धरम ,करम है |
वल्कल वस्त्रों के पीछे अब ,
मंजनूपन का छाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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जिन्हें देश पर मरना चहिये,
वही देश को लूट रहे हैं |
श्वेत वस्त्र ,गाँधी की टोपी ,
सुरा सुंदरी ठाट हैं ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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