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Friday, August 7, 2015

मेरी लेखनी

मेरी लेखनी 

मन में उठे विचार को कैसे बयाँ करूँ |
थी पास मेरी लेखनी सो उससे कह दिया ||
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इक बात तहे दिल में छिपा करके रखी थी |
लिख करके सरेआम वो सबको दिखा दिया ||

बातों ही बातों में मेरी हमदर्द कब बनी |
मुझको नहीं पता पर सबको बता दिया ||

रहती है हमसफ़र की तरह की पास ये मेरे |
चुपके से मेरे राज को बेराज कर दिया ||

मुझको नहीं आजाद तनिक भी भनक लगी |
पर सबको मेरी दास्ताँ इसने सुना दिया ||

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