जरा सोचिए
![]() |
छोड़ गए जो समय रेत पर पद-चिह्नों की अनुपम छाप |
क्या कुछ कदम चले हम उस पर जरा सोचिए अपने आप ?
बीत गया इक लम्बा अरसा फिर मन में क्यों छाया दर-सा ?
जब यह खही पट जाएगी तब सचमुच आज़ाद हैं आप ||
आज़ादी के इस अवसर जश्न मनाते करते जलसा ||
खादी की पोशाक पहन ली वाणी पर अंग्रेजी छाप ||
मनोकामना उन वीरों की जिसने देखा था इक सपना ,
शोषण ,संशय ,संताप परे प्यारा भारत होगा अपना ||
क्या उनके स्वप्निल भारत की चर्चा कभी किये है आप ?
धर्म, जाति ,सम्प्रायवाद की नीति चला रखी है हमने |
आतंकी माहौल बनाकर लूट मचा रखी है हमने ||
गुंडे और बदमाश लुटेरे शासन की रचते परिमाप ||
अपनी कुर्सी रहे सलामत भले देश पर आये आफत |
कड़ी सुरखा बीच तिरंगा फहराए यह कैसी चाहत ?
संसद में आतंकी हमले कहीं न हों जाए चुपचाप ||
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख ,इसाई कहने को हम भाई-भाई |
धर्मवाद ,सम्प्रायवाद फिर क्यों इतनी गहरी खाई ?|
![]() |


No comments:
Post a Comment