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Sunday, February 21, 2016

चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और
जहाँ हो प्रेम की नगरी |

प्रेम धरा के कण- कण में हो नभ में  प्रेम की बदरी ||
प्रेम की भाषा  प्रेम की आशा  प्रेम सुधा  रस गगरी ||

प्रेम पियासा जन अभिलाषा मुख  में प्रेम की मिसरी ||
प्रेम विटप पर  प्रेम के पंछी  छेड़त  प्रेम की ठुमरी ||

प्रेम छवी नैनन दर्शाती  खोलत अधर प्रेम की गठरी ||
कहि ‘आजाद’ मनहिं भीतर में तेरो है प्रेम की नगरी ||


Monday, February 1, 2016

हो रहे हैं हल्के रिश्ते




हो रहे हैं हल्के रिश्ते.......




हो रहे हैं हल्के रिश्ते आजकल के जमाने में |
प्यार भी हल्का हुआ है आज आजमाने में ||
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अब तो बस प्यार में नुमाइशी चेहरे दिखते हैं |
गर्दन कटानेवाले मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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वादे और कसमों की बौछार तो करते बहुत |
उसे निभानेवाले मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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चन्द सिक्कों के लिए जान लेने पर उतारू  |
सबर करनेवाले मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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तन, मन, धन लुटानेवाले दोस्ती के नाम पर |
ऐसे दिलेर दोस्त मिलते अब कहाँ जमाने में ||
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हो गयी हैं मतलबी  दिल की धड़कने शायद |
औरों के गम में धडकती अब कहाँ जमाने में ||
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सच कहें ‘आजाद’ सपने भी पराये हो गए |

सपने आँखों में हैं बसते अब कहाँ जमाने में || 


Friday, January 29, 2016

चंचल मन मेरो कहा न माने |



चंचल मन मेरो कहा न माने |

जब  जब इसको  रोकन चाहूँ  सुनत न  बात  सयाने |
इक पल रुकत पुनः फिर भाजति  नाना  करत  बहाने||

करम धरम और योग  ध्यान में कुछ पल रुकत रुकाने |
जैसहि  थोड़ा  अवसर  पावत  करत   अन्यत्र  पयाने ||

बीते पल  को सोचि- सोचि  कर  लागत  अश्रु  बहाने |
कहि ‘आजाद’ कछु समझ न आवत काम करत मनमाने ||

कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर ‘आजाद’
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़ ,झालावाड़ (राज.)

मोबाईल- 9414750971 

Monday, January 25, 2016

हमारा तिरंगा

        हमारा तिरंगा

    यह तिरंगा जो हमारे देश का अभिमान है |
           और हम सारे वतन के वासियों की शान है |
    जान पर भी खेलकर झुकने नहीं देंगे इसे ,
           बूंद- बूंद रक्त भी इसके लिए कुर्बान है |

    यह शहीदों की अमर गाथा सुनाता है हमें ,
           शौर्य और पराक्रम की बातें बताता है हमें |
    इसके लहराने में जैसे नौजवानों की है मस्ती ,
           लहरकर उनकी विजय गाथा सुनाता है हमें ||

    हरे रंग से धरती की हरियाली इसको प्यारी है |
       जंगल बाग़ खेत उपवन में इसकी ही छवि न्यारी है |
    श्वेत रंग सच्चाई के पथ पर चलने का देता ज्ञान ,
        सदा सत्य पर चलो साथियों इसमें जीत तुम्हारी है ||

    केसरिया रंग हम में साहस कूट-कूट भर जाता है |
         उठो जवानों !आगे आओ तुमको देश बुलाता है |
    समय चक्र देता संदेशा आगे बढ़ो हे भारतवीर !
         नहीं समय की क़द्र करे जो जीवन भर पछताता है ||




          


Saturday, January 23, 2016

क्रांति की ज़रूरत



    

क्रांति की जरुरत 





एक क्रांति तो  पहले हुई थी गोरों को  मार भागने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

चले गए अँग्रेज मगर  अंग्रेजीपन को  छोड़ गए |
शासन प्रशासन में अपने पुतले वंशज छोड़ गए |
वैसी  भाषा  वैसी बानी  खानपान भी  वैसा है |
लूटपाट का  वही तरीका  अकड़ फिरंगी जैसा है ||

इनको  कोई कुछ  कह दे तो  आदत इनकी गुर्राने की |  
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

रोज  शहीद  हुआ करते  हैं  सैनिक  सीमाओं पर ,
फिर भी दिल्ली क्यों चुप दिखती ऐसी घटनाओं पर ?
बस केवल दो चार दिवस अफ़सोस जताया जाता है |
उनकी वीर कथाओं का  गुणगान  सुनाया जाता है ||

भाषण- भूषण दौड़ा- दौड़ी जनता  को बस दिखलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

आज तिरंगा जाने क्यों मायूस  दिखाई पड़ता है ?
राष्ट्रगान में शौर्य नहीं अब शोर सुनाई पड़ता है |
लोकतंत्र की अरथी उठती मगर किसे परवाह है |
अपनी कुरसी रहे सलामत नहीं और कुछ चाह है ||

रोज- रोज वादे  करते जनता  को फिर से फुसलाने की |
एक क्रांति की आज जरुरत जनगण मन को जगाने की ||

भ्रष्ट्राचार और अनाचार से धरा हो  गई है  बोझिल |
प्रेम और सौहार्द्र से सूखे सभ्य जनों के दिखते दिल |
इज्ज़त बे-इज्ज़त होने में कोई समय नहीं लगता है |
अपराधी सीना ताने अब  कानून  को गाली देता है ||

क्या यही था भारत का सपना जिस पर मर मिटजाने की ?
एक क्रांति  की आज जरुरत जनगण  मन को जगाने की ||










चल सजनी उस देश


चल सजनी उस देश......


चल सजनी उस देश ,

जहाँ तेरो प्रीतम रहते |

बहुत दिनन से खबर  न आई  नहिं  पाती सन्देश |

ना जाने  किस हाल  में होंगे  मन में उठत क्लेश |

तन मन को कछु नीक न लागै साँस बची बस शेष |

रात न बीतत दिन नहिं आवत भावत  नहिं परिवेश |

प्रीतम  गेह  दूर अति  हौवे नहिं  कोई संग विशेष |

तम का मार्ग  कंटकमय जहाँ ऐसो  प्रीतम का देश |

मन आज़ाद मिलनों को चाहे बिनु किए इक छन लेश ||







Wednesday, January 20, 2016

सखि, मन मेरो स्थिर नाहीं |


सखि, मन मेरो स्थिर.........


सखि, मन मेरो स्थिर नाहीं |
पिया  प्रेम में  भयौ दिवानो, बसत है उनकी ठाहीं |
भ्रमर रूप धरि चहुँदिश भटकत,पास टिकट है नाहीं |

सोचि-सोचि कर कबहूँ हँसूं तो छन उदास होई जाहीं |
नैननि सो भयौ नींद नदारद मन कछु समझत नाहीं |

बिसरावन की लाख जुगति करि सपनन परत दिखाहीं |
मन ‘आजाद’ पिया के बस में करी सकती कछु नाहीं ||