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Sunday, February 21, 2016

चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और
जहाँ हो प्रेम की नगरी |

प्रेम धरा के कण- कण में हो नभ में  प्रेम की बदरी ||
प्रेम की भाषा  प्रेम की आशा  प्रेम सुधा  रस गगरी ||

प्रेम पियासा जन अभिलाषा मुख  में प्रेम की मिसरी ||
प्रेम विटप पर  प्रेम के पंछी  छेड़त  प्रेम की ठुमरी ||

प्रेम छवी नैनन दर्शाती  खोलत अधर प्रेम की गठरी ||
कहि ‘आजाद’ मनहिं भीतर में तेरो है प्रेम की नगरी ||


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