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Saturday, July 25, 2015

एक पंछी डाल

एक पंछी डाल---------

एक पंछी डाल---------

एक पंछी डाल तजकर उड़ गया है |
वह तरु की डाल सूना कर गया है ||

       मौन है सारी दिशाएँ, सब परिंदे मौन हैं |
            मौन मारुत की चपलता,आशियाने मौन हैं |
                 दिख रहे चुपचाप जैसे ,उनका कोई खो गया है |
                       एक पंछी डाल तजकर उड़ गया है ---------------|

पेड़ सूना-सा खड़ा है ,डालियाँ चुपचाप हैं |
     पत्तियां कम्पन रहित हैं , कोंपलें मुरझा गयी हैं |
           भ्रामरी संगीत जैसे भ्रमरों से छिन गया है |
                 एक पंछी डाल तजकर उड़ गया है ---------------|

       यह तमन्ना सब की है , वह लौट कर आ जायेगा |
      और खुशियों का जखीरा साथ अपने लायेगा |
      पर अभी आया नहीं सूर्यास्त भी तो हो गया है |
      एक पंछी डाल तजकर उड़ गया है ---------------|

रात गहराने लगी है ,धड़कने बढ़ने लगी है |
           लौटने की आस में अब दूरियां बढ़ने लगी हैं |
                फासला अब और ज्यादा लौटने का हो गया है |
                     एक पंछी डाल तजकर उड़ गया है ---------------|

तरु खड़ा लाचार बेबस ,शीत अश्रु टपकता है |
      बार -बार उसकी यादों में मचलता तड़पता है |
              सोचता है हे ! विधाता आज ये क्या हो गया है |                  
                    एक पंछी डाल तजकर उड़ गया है ---------------|



                        
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समाज और बाजार

समाज और बाज़ार

नेता अभिनेता चाहे मंतरी व संतरी हों ,
सभी लोग देशवा के लूट मिलि खात हैं |
सरकारी कर्मचारी बन गए व्यभिचारी ,
सरकारी कोष के लुटल आम बात है ||

चोर लूटै चोरी से डकैत सीना जोरी से ,
चोरी करने में ये न तिनकों डरात हैं |
धनपति धन द्वारा ,बलपति बल द्वारा ,
शोषण करन में लगल दिन रात हैं ||

नौकर की नौकरी में ,चाकर की चाकरी में ,
सेवा धर्म रंच मात्र ,अब न लखात हैं |
अधिकारी यदि कभी ,काम करने को कहे,
कहने पर आँख काढि और गुर्रात हैं ||

बेटी के सुहाग बिके, पत्नी औलाद बिके,
कैसे -कैसे वोट भी चुनाव में बिकात हैं |
चहुँ ओरक्रेता और विक्रेता की दुकान लगी ,
सत्य व ईमान जहाँ सस्ते बिकात हैं||

धर्म बिकै कर्म बिकै नारियों के शर्म बिकै,
मंदिरों में संत के भजन भी बिकात हैं |
आज के समाज की आज़ाद क्या बखान करूं ,
खड़े -खड़े लोगों के ज़मीर बिक जात हैं ||

बापू बचपन में शादी

बाल-विवाह कानूनन अपराध है 

 (एक बालिका का निवेदन: अपने पिता से) 

बापू बचपन में शादी जनि रचावा हमरी |
      हो ! रचावा हमरी ,हो! रचावा हमरी||---बापू --

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अबहीं उमर है पढ़न-लिखन की ,भेजा तू स्कूल |
     विद्या ज्ञान से महकी आपन घर आँगन और कूल |
          सोना-चांदी सी जिनिगिया जनि लुटावा हमरी ||---बापू --

शादी ब्याह के  बन्धन में अबहीं ना हमके बाँधा |
     शादी खुशहाली से बढ़कर ना जानी कुछ ज्यादा |
          नाहीं जिनिगिया माटी मा, मिलावा हमरी ||---बापू --

बाल-विवाह सुना हे बापू कानूनन अपराध |
       यहि के चक्कर में परिके हो जइबा तू बरबाद|
           कहते ''आज़ाद '' माना ई कहनवा हमरी ||---बापू                                    



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तुम शिक्षक हो

तुम शिक्षक हो -----

तुम शिक्षक हो -----

तुम शिक्षक हो 
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मुँह मोड़ नहीं सकते हो ,अपने कर्तव्यों से |
तुम ही तो कुछ कर सकते हो -
नन्हें पौधे सम बच्चे में 
ज्ञानांकुर को विकसित करके 
और प्रेम के अमृत जल से 
उसे सींचकर ,
होनहार, मजबूत वृक्ष सम कर सकते हो------

शिक्षा-विक्रय-केन्द्र बनाकर 
पैसे लेकर ज्ञान बेचना 
यह कैसा है धर्म तुम्हारा ?
दस पैसे में तुमने बेंचा 
कल वह बीस में बेचेगा |
आने वाला विक्रेता तो 
देश बेंचकर खा जायेगा |
ऐसे विक्रेताओं से आस नहीं तुम कर सकते हो ---

देश ,समाज के भाग्य विधाता तुम हो 
तुम से देश ,देश से तुम हो |
अपनी शक्ति ,धर्म को जानो 
जैसे नींव बना दोगे तुम 
वैसे पुख्ता देश तुम्हारा बन जायेगा | 
नकर के चाणक्य चन्द्रगुप्त तुम्हीं देश को दे सकते हो----

ज्ञान, मान-सम्मान आज सब ऐसे बिकता 
चीनी ,चावल, डाल ,तेल जैसे है बिकता 
बस पैसे के खातिर शिक्षक बिकता 
ऐसा करके गुरु सम मान न पा सकते हो ------
आज जगत को शिक्षक की पहिचान बता दो 
दिगभ्रमित नवयुवकों को ,
तुम राह दिखा दो |
उनके अन्दर देश-प्रेम का भाव जगा दो |
ऐसा करके तुम सोये उनके भाग्य जगा सकते हो -----

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दो कदम साथ

दो कदम का साथ

दो कदम का साथ 

दो कदम साथ चलने के अंदाज़ में ,
          साथ मैं उसके चलता चला ही गया |
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याद मुझको नहीं कुछ रहा इस कदर ,
          उसकी बातों में मैं इस तरह खो गया ||

चन्द लम्हों की उसकी मुलाकात को,
          किस तरह से कहूँ उस ख्यालात को ,
बात उसकी मुझे कुछ लगी इस तरह,
         उसकी  बातों  में  मैं  डूबता  ही गया ||

जिसके जुल्मों सितम को दुआ मानकर ,
         रात-दिन जिसको दिल में बसाये रखा |
उसने  उल्फ़त की दीवार को तोड़कर ,
         छोड़   मुझको  अकेला चला  ही गया ||

कैसे दिल को तसल्ली दें 'आज़ाद' हम ,
        अब  सहारा  नहीं  कुछ नज़र आ रहा |
गम छिपाने की कोशिश बहुत की मगर,
        जाते-जाते   हमें  वह  रुला  ही  गया ||

निगाहें बोलती हैं

निगाहें बोलती हैं --------

निगाहें बोलती हैं --------

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निगाहें बोलती हैं प्रेम और नफ़रत की भाषाएँ ,
हमें बस उसको सुनने और समझने की ज़रूरत है ||
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हसरतें पूरी हो सकतीं ,भले ही मुश्किलें आयें |
हमें बस उसको मन में ठान लेने की ज़रूरत है ||
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किसे अपना कहें या किसको कह दें पराया है |
हमें बस वक्त पर उसको परखने की ज़रूरत है ||
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दलीलें पेश करने से नहीं सच झूठ होता है |
हमें सच सामने सबके ले आने की ज़रूरत है||
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दर्द में हर कोई सच्चा नहीं हमदर्द होता है |
हमें 'आज़ाद' उसको आजमाने की ज़रूरत है ||

Friday, July 24, 2015

आजाद- पूज्य माता-पिता के सादर चरणों में समर्पित

                               समर्पण 

                          पूज्य माता-पिता  के सादर चरणों में समर्पित 

पकड़  उँगलियाँ जिनकी मैंने ,
       
          चलना सीखा  कदम-कदम |
                 
                  उन्हें समर्पित करता हूँ  मैं ,
                         
                         अपने मन का काव्यसुमन ||


मुझ पर ममता वारने वाले ,
        
           मेरा सब कुछ तुम्हें समर्पण |
                
                    हे ! मेरे तन -मन के पोषक ,
                      
                            तुम्हें समर्पित 'काव्यसुमन '||
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