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Saturday, March 5, 2016

बसंतागमन



               बसंतागमन
 चहक उठे खग बगियन में फूलों से खुशबू आई है |
 ऋतुराज बसंत के स्वागत में भौरों ने तान सुनाई है ||
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 आम गए बौराए सुवास बिखेरत आपन |
 फाग के राग सुनाय कोयल फिरती घर आँगन |
 गरमी के तेवर देखि देखि ठंडी बहुतै घबराई है ||
 ऋतुराज बसंत के स्वागत में भौरों ने तान सुनाई है ||
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 खेतों मुस्काय रही है सरसों पीली ,
 ओढ़ चुनरिया चमक रही है अलसी नीली |
 गेहुवन की बाली देखि देखि कृषक नैना हरषाई है ||
 ऋतुराज बसंत के स्वागत में भौरों ने तान सुनाई है ||
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 लाल, हरे ,पीले ,नीले परिधान पहनकर ,
 अवनि लग रही जैसे कोई परी हो सुन्दर |
 देख अर्क की चंचल नज़रें वह कुछ कुछ शरमाई है ||
 ऋतुराज बसंत के स्वागत में भौरों ने तान सुनाई है ||
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 उर स्पर्शी पवन करे तन मन को विह्वल ,
 चहक उठी नूतन उमंग संग प्रकृति चंचल |
 यौवन में उन्मत्त प्रकृति आँचल अपनी सरकाई है ||
 ऋतुराज बसंत के स्वागत में भौरों ने तान सुनाई है ||

    कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर ‘आजाद’
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़ ,झालावाड़ (राज.)
    मोबाईल- 09414750971,09982395653 

Friday, March 4, 2016

मज़हबी राह से

मजहबी राह से ......
  
 मजहबी  राह  से  गुमराह  होकर  ऐसा है लगता |
  देश अपना है फिर भी जाने क्यूँ अपना नहीं लगता ||

  चलो इक बार हम भी  देश के  होकर दे तो  देखें |
  सोच लोगों की  बदलते हुए  पल भर  नहीं लगता ||

  दूर रखकर  सियासत से  धरम को  आजमाएं हम |
  धर्म को धर्म से  मिलते हुए पल  भर नहीं लगता ||

सभी इंसान  अपने कर्म और  ईमान पर  यदि हों |
  फिर तो इंसानियत को फैलते पल भर नहीं लगता ||

गले अपनों को न लगाएं तो नज़रों से न गिरने दें |
  अपने जो हैं पराये बनने में  पल भर नहीं लगता ||

  कोई मजहब  नहीं हो सकता मेरे  मुल्क से बढ़कर |
  ऐसे मजहब को मिटने में कभी पल भर नहीं लगता ||

  देश में हम  नहीं बसते देश हम  सब में बसता है |
  सुनो ‘आजाद’ ऐसे  मुल्क को कोई छू नहीं सकता ||


कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर ‘आजाद’
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़ ,झालावाड़ (राज.)
मोबाईल- 9414750971


       

Wednesday, March 2, 2016

देशप्रेम और देशद्रोह



          देशप्रेम और देशद्रोह
  देशप्रेम और देशद्रोह ये कहने की कोई बात नहीं |
  ये किस दिल में कब आ जाए यह भी किसी को ज्ञात नहीं ||
  परिवर्तन के नव उमंग में मुख से कोई क्या कह दे |
  राजनीति के नज़रों से इसे देखना कोई बात नहीं ||

  देशद्रोह और देशप्रेम पर राजनीति जो करता है |
  ऐसा नेता कभी देश का भला नहीं कर सकता है ||
  अपने स्वारथ के खातिर कुछ ऐसे चर्चे यदि होंगे ,
  भला बताओ सच्चाई को कौन बयाँ कर सकता है ?

  देशद्रोह की परिभाषा यदि नारों से तय होती है |
  फिर देशप्रेम के नारों पर क्यों राजनीति नहिं होती है ?
  सरहद पर सैनिक मरते हैं फिर नेता चुप क्यों रहते हैं ?
  दो शब्द शोक के कहने से क्या देशप्रेम हो जाता है ?

  उस माँ से पूछो जिसके आँखों का तारा छिनता है |
  उस माँ के आँखों में क्या देशप्रेम नहीं दिखता है ?
  राजनीति से दूर रखो इस देशद्रोह के नारों को ,
  औरों को देशद्रोह कहने से देशप्रेम नहीं बढ़ता है ||

  कानून और धाराओं से यदि देशद्रोह को हम मापें |
  तो देशप्रेम को भी कोई कानून व धारा में जांचे ||
  क्या देशविरोधी नारेबाजों से ये कभी किसी ने पूछा है ?
  क्या उन्हें अदालत और जेल में बन्द करना ही देशप्रेम है ?      
  जब लोकतंत्र के मंदिर में कुर्सी,मिर्ची ,जूते चलते |
तो भला बताओ इसमें कौन सा देशप्रेम झलकता है ?
यही नहीं बातों बातों में गोली और पिस्तौल निकलती ,
यह कैसा है देशप्रेम जो संसद में दिखता है ?

अमर्यादित लोकतंत्र यदि देशप्रेम कहलाता है |
फिर अपने मन की अभिव्यक्ति क्यों देशद्रोह बन जाता है ?
आज जरुरत आन पड़ी है इसे समझने समझाने की ,
ऐसी नौबत इतने वर्षों बाद भला क्यों  आई है ?




         

Sunday, February 28, 2016

मन पंछी उड़ि चलियो ,



   

मन पंछी उड़ि चलियो ,

मन पंछी उड़ि चलियो ,
जहाँ हो चैन की बगिया |

रकम-रकम के बिरवा हों जहाँ मलय पवन की छहिंया |
द्वेष –प्रेम दोउ गले मिलत हों बन जीवन की पहिया ||

राग रंग के पुष्प  खिले हों भ्रमर  भुलत जहाँ रहिया |
मस्त लुभावन मन को भावन टेरत  सुर जहाँ पपिहा ||

मधुर मनोहर पिक सुरसरिता बहती बिनु छन रुकिया |
हर दरख़्त  जहाँ झूम  झूमकर फाग  सुनावत रसिया ||

पादपपुष्प  झूमत  मस्ती से  करत  संग अठखेलियाँ |
कहत ‘आजाद’ सुनहूँ मन मेरो कर ले प्रेम की बतिया ||

कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर ‘आजाद’
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़ ,झालावाड़ (राज.)

मोबाईल- 9414750971 



Thursday, February 25, 2016

एक विचार जीवन सार

                एक विचार: जीवन सार  


कहि आजाद जब दुखित मन,माँगहु हंसी उधार |
      इससे पुनि खिल जाएगा, खुशियों का संसार ||1||

कहि आजाद न अस गिरौ, नज़र न सकौ मिलाय |
       गिरना है तो असि गिरहु, सब तोहिं लेहिं उठाय ||2||
     
चिंता की सँकरी गली ,जो कोई घुसि जाय |
      कहि आजाद बिरला कोई ,वापस फिर आ पाय ||3||
      
 अपनी सुनि तारीफ़ मैं ,फूला नहीं समाय |
      सुनि आजाद जब और की ,मुझसे रहा न जाय ||4|| 
     
मुझसे लई आपन  कहत , मोको रह्या दिखाय |
      कहि आजाद असि लोग से बचि के रहियो भाय ||5||
     
 पर सोना पीतल कहै ,निज पीतल को स्वर्ण |
      पड्यौ जौहरी सामने ,धूमिल हो गयौ वर्ण ||6|| 

कवि एवं साहित्यकार –रामचंदर आजाद
जवाहर नवोदय विद्यालय झालावाड़ (राज.)
मोबा.9982395653

       

एक विचार जीवन सार

                एक विचार: जीवन सार  


कहि आजाद जब दुखित मन,माँगहु हंसी उधार |
      इससे पुनि खिल जाएगा, खुशियों का संसार ||1||

कहि आजाद न अस गिरौ, नज़र न सकौ मिलाय |
       गिरना है तो असि गिरहु, सब तोहिं लेहिं उठाय ||2||
     
चिंता की सँकरी गली ,जो कोई घुसि जाय |
      कहि आजाद बिरला कोई ,वापस फिर आ पाय ||3||
      
 अपनी सुनि तारीफ़ मैं ,फूला नहीं समाय |
      सुनि आजाद जब और की ,मुझसे रहा न जाय ||4|| 
     
मुझसे लई आपन  कहत , मोको रह्या दिखाय |
      कहि आजाद असि लोग से बचि के रहियो भाय ||5||
     
 पर सोना पीतल कहै ,निज पीतल को स्वर्ण |
      पड्यौ जौहरी सामने ,धूमिल हो गयौ वर्ण ||6|| 

कवि एवं साहित्यकार –रामचंदर आजाद
जवाहर नवोदय विद्यालय झालावाड़ (राज.)
मोबा.9982395653




       

Sunday, February 21, 2016

चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और


चलो सजन कहिं और
जहाँ हो प्रेम की नगरी |

प्रेम धरा के कण- कण में हो नभ में  प्रेम की बदरी ||
प्रेम की भाषा  प्रेम की आशा  प्रेम सुधा  रस गगरी ||

प्रेम पियासा जन अभिलाषा मुख  में प्रेम की मिसरी ||
प्रेम विटप पर  प्रेम के पंछी  छेड़त  प्रेम की ठुमरी ||

प्रेम छवी नैनन दर्शाती  खोलत अधर प्रेम की गठरी ||
कहि ‘आजाद’ मनहिं भीतर में तेरो है प्रेम की नगरी ||