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Friday, December 11, 2015

आज़ाद के दोहे


आज़ाद के दोहे -


मैं   अपने   को    मानता ,  सबसे   बड़ा   चलाक |
पर  जब   देखा  आपको ,  मैं  रह   गया   अवाक ||1||
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हि 'अजाद' मन साफ़ हो , का करि सकत कलंक |
कमल  सदा   ही  खिलत  है  ,नीर  होहिं  या  पंक ||2||
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निरखत निरखत और  को , भयौ  सुबह  से  शाम |
अपने  को   निरखा   नहीं ,  बीत्यौ  उमर  तमाम ||3||
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हि  'अजाद'  जब  आपने , गिरवी  रखी  ज़मीर |
फिर यह कहि  क्यों  झंखते , फूट  गई   तकदीर ||4||
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प्रेम  खिलै   नफ़रत  मिटे , दिल  में  उठे    हुलास |
कहि 'अजाद'  जब नहिं  रहै,  कोई   आस  निरास ||5||
                                       
                                       'आज़ाद सतसई' से -

                                   
                                       





Thursday, December 10, 2015

दिल मे उल्फत


दिल में उल्फत ----




दिल में उल्फत पर निगाहों से न भरमाया करो |
सच कहूँ तो इस तरह से  ज़ुल्म  न ढाया करो ||
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लौट कर आता नहीं गुजरा  ज़माना  फिर कभी ,
इसलिए तो  कह  रहा हूँ  वक्त न  जाया करो ||
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दिल को छू  जाता है मेरे आपका मासूम चेहरा ,
आईने  में   देखकर  यूँ   न  शरमाया  करो ||         ************************
जो हकीकत है छिपाने से नहीं  छिपती  कभी ,
चाँद से चेहरे को आँचल में न  छिपाया  करो ||
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                     छा रही काँधे पे जुल्फों की घनी  काली घटाएं ,
      यूँ  हवाओं  में झटक  उनकों न फहराया करो ||
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      भा गई ‘आज़ाद’  कातिल वह लजाने की अदा ,
      सच में पलकों को झुकाकर यूँ न शरमाया करो ||






Tuesday, December 8, 2015

मौक़ापरस्त


जिसे देखो वही यहाँ पर ,
        कुछ न कुछ भुनाने  में लगा है |
कोई यश तो कोई पैसा तो ,
       कोई कोई हंसाने में लगा है |
अजी मामला यहीं नहीं थमता ,
        कोई-2 तो पहचान बनाने में लगा है ||

उलटे-सीधे बयानबाजी करके ,
          कोई तो जनप्रिय हो जाने में लगा है |
यह भी एक जीवन का सच है |
        कोई कोई किस्मत आजमाने में लगा है |
ना जाने क्यों कुछ समझ में नहीं आता ,
        इसीलिए कोई कोई मुझे समझाने में लगा है ||

दीवार ऊँची है ,चिकनी है फिर भी,
        कोई कोई छलांग लगाने में लगा है|
ये कैसा वक्त है ,आदमी स्वयं में मस्त है |
         हर कोई अपनी धुन सुनाने में लगा है |
कुछ सुनकर अनसुने कर देते हैं |
         ऐसे अन्सुनों को भी सुनाने में लगा है ||

अजीब रिश्ता है सांस का जीवन से ,
         जो शाश्वत निभाने में लगा है |
दर्द के लिए दवा तो है मगर ,
          फिर भी बेदर्द रूलाने में लगा है |
प्रीति की डोर टूट न जाए कहीं ,
            इसीलए वह आँसू बहाने में लगा है ||

ऊँचे-ऊँचे मकान हैं सड़कों के किनारे ,
          जिसे आदमी रंग-रोगन से सजाने में लगा है |
जो कल तक खँडहर था वीरान था ,
        आज वह मानव स्पर्श से जगमगाने लगा है |
सच कहा है किसी ने कभी घूरे के दिन भी लौटेंगे |
        आज के वक्त में आदमी उसे पहचानने लगा है ||








Monday, December 7, 2015

जीवन एक कहानी है |

जीवन एक कहानी है |


जीवन एक कहानी है |
    प्यार की अमिट निशानी है |
सुख-दुःख के दो पहियों पर,
    चाल   बड़ी  मस्तानी है ||

जीवन इक परिभाषा है |
    सबको इससे आशा है |
कभी नहीं जो पूरी होती ,
    यह ऐसी अभिलाषा है ||

जीवन ऐसा सपना है |
     कभी नहीं जो अपना है |
जिसे प्राप्त करने के खातिर ,
    निस-दिन सबको खपना है ||

जीवन ऐसा गीत है |
     प्यार भरा संगीत है |
होठों की मुस्काहट के संग ,
    दिलों दिलों की प्रीति है ||

जीवन एक तपस्या है |
     जिसमे कठिन समस्या है |
बार –बार बाँधा बन आती ,
    जैसे   कोई   वैश्या  है ||

जीवन एक परीक्षा है |
    पास फेल की  इच्छा है |
कभी पास तो कभी फेल बन ,
    देती  सबको  शिक्षा है ||

जीवन एक पहेली है |
    कुछ ही पल की सहेली है |
ना जाने कब साथ छोड़ दे ,
    यह  अनबुझी  पहेली है ||

जीवन ऐसी सच्चाई है |
    जिसमे खूब  लड़ाई है |
जो सचमुच में लड़ाकू है |
     पार  उसी  ने पाई है ||







Saturday, December 5, 2015

कब तक सच के मारे----


कब तक सच के मारे----


कब तक सच के मारे मारे फिरते रहेंगे |
     आओ मिलकर फिर से नव निर्माण करें||
जाति,धर्म के बोझ को कब तक हम ढोयेंगे|
     इसे  छोड़  मानवता के हित कार्य करें ||
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झूठी शान के हम लिबास कब तक पहनेंगे |
     इसे  उतार  नए  युग  की  शुरुआत करें ||
रूढ़िवादिता की परिपाटी से चिपके हम ,
     सकल विश्व के जनगण मन का मान करें ||
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हम अपने को क्यों आँके परमाणु शक्ति से ,
     करना  है  तो  इससे  जन  कल्याण करें |
इसके विध्वंसक रूपों से खुद को बचाएं ,
     क्यों इससे हम धन जन का नुकसान करें ||
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हम दूजों को नीचा दिखलाने के खातिर ,
     रोज  रोज  क्यों  नयी घिनौनी चाल चलें |
अच्छे करतब की राहों के अनुयायी बन ,
     ऊँचा  बनना  है  तो  ऊँचे  काम  करें ||
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समरसता के बीज दिलों में तब उपजेंगे ,
     जब हम उनके दिलों में अपनी जगह करें |
छल धोखे का मार्ग बड़ा ही दुखकर है ,
     इसे  छोड़ हम सबके दिल पर फतह करें ||
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नहीं कभी आतंक क्रूरता जीत सकेंगे ,
     चाहे  लाखों   यत्न  और   प्रयास  करें |
सदा सदा से वे मुँह की खाते आयें हैं ,
     इसीलिए  हम क्यों उन पर विश्वास करें ||
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जिस मिट्टी में हमने खेलें हैं बचपन में ,
      उस मिट्टी  पर गर्व और अभिमान करें |
ऐसी मिट्टी के खातिर कुछ भी हो जाए ,
      प्राणार्पित कर हम उसका सम्मान करें ||



Friday, December 4, 2015

जमाने वाले

            ज़माने वाले
तिल सरीखी बात को ताड़ बना देते हैं  ज़माने वाले |
कीचड़ उछालने में तनिक न शरमाते हैं ज़माने वाले ||

लोहा गरम है  चलो हम भी  हथौड़ा  चला देते  हैं |
क्या असर होगा ये फिकर नहीं  करते  ज़माने वाले ||

आपकी बात को तो नज़रअंदाज करना तो आमबात है |
जिसे सुनते हैं बहुत कम मगर सुनाते हैं ज़माने वाले ||

कहीं भूल से  गलती  हो गयी  आपसे तो  ज़रा सोचो |
कोई कोर कसर नहीं रखते खिल्ली उने में जमाने वाले ||

आपकी शोहरत कहीं आपको मुकाम तक न पहुंचा दे |
इसलिए पैर खींचने से बाज नहीं आते हैं ज़माने वाले ||

आपकी  मुस्कराहटों में  इजाफा की  आशंका देखकर |
गम में तबदील करने के बहाने बनाते हैं ज़माने वाले ||

ये कैसे लोग जो  भाई भाई को जुदा करने में माहिर |
और ‘आजाद’ फिर दरियादिली दिखाते हैं ज़माने वाले ||
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Tuesday, December 1, 2015

हम कैसे भूल----


            हम कैसे भूल----

हम कैसे भूल  सकते उन्हें  देश के लिए |
थे  बेगुनाह फिर भी  मरे देश  के लिए ||

जिनका न किसी से कोई झगड़ा न लड़ाई,
फिर भी हुए कुर्बान  अपने देश  के लिए ||

मज़हब के सियासी रगों से थे जो बेखबर,
मज़हब के वे शिकार  बने देश  के लिए ||

आतंक से जिनका ना दूर दूर का रिश्ता,
वे आह के भी घूँट पिए देश के लिए ||

बसता था दिल में जिनके देश का गौरव,
वे सो गए सदा सदा इस देश के लिए ||

इतिहास तो नहीं बने वे देश के खातिर ,
पर हर जुबाँ ने शोक कहा देश के लिए ||

‘आज़ाद’ इस जमीं पे जो आया है जाएगा,
मरके भी प्यार कम न हुआ देश के लिए ||