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Friday, December 4, 2015

जमाने वाले

            ज़माने वाले
तिल सरीखी बात को ताड़ बना देते हैं  ज़माने वाले |
कीचड़ उछालने में तनिक न शरमाते हैं ज़माने वाले ||

लोहा गरम है  चलो हम भी  हथौड़ा  चला देते  हैं |
क्या असर होगा ये फिकर नहीं  करते  ज़माने वाले ||

आपकी बात को तो नज़रअंदाज करना तो आमबात है |
जिसे सुनते हैं बहुत कम मगर सुनाते हैं ज़माने वाले ||

कहीं भूल से  गलती  हो गयी  आपसे तो  ज़रा सोचो |
कोई कोर कसर नहीं रखते खिल्ली उने में जमाने वाले ||

आपकी शोहरत कहीं आपको मुकाम तक न पहुंचा दे |
इसलिए पैर खींचने से बाज नहीं आते हैं ज़माने वाले ||

आपकी  मुस्कराहटों में  इजाफा की  आशंका देखकर |
गम में तबदील करने के बहाने बनाते हैं ज़माने वाले ||

ये कैसे लोग जो  भाई भाई को जुदा करने में माहिर |
और ‘आजाद’ फिर दरियादिली दिखाते हैं ज़माने वाले ||
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Tuesday, December 1, 2015

हम कैसे भूल----


            हम कैसे भूल----

हम कैसे भूल  सकते उन्हें  देश के लिए |
थे  बेगुनाह फिर भी  मरे देश  के लिए ||

जिनका न किसी से कोई झगड़ा न लड़ाई,
फिर भी हुए कुर्बान  अपने देश  के लिए ||

मज़हब के सियासी रगों से थे जो बेखबर,
मज़हब के वे शिकार  बने देश  के लिए ||

आतंक से जिनका ना दूर दूर का रिश्ता,
वे आह के भी घूँट पिए देश के लिए ||

बसता था दिल में जिनके देश का गौरव,
वे सो गए सदा सदा इस देश के लिए ||

इतिहास तो नहीं बने वे देश के खातिर ,
पर हर जुबाँ ने शोक कहा देश के लिए ||

‘आज़ाद’ इस जमीं पे जो आया है जाएगा,
मरके भी प्यार कम न हुआ देश के लिए ||





Monday, November 30, 2015

पञ्च विचार: दोहे

पञ्च विचार: दोहे  


पने मुख मत कीजिये , अपना ही गुणगान |
कहि ‘आजाद’ इससे नहीं ,कभी बढ़त है मान ||1||
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ल में लाठी मारिये , जल  में  पड़े न फ़र्क |
ऐसहि जिद्दी लोग से , व्यर्थ  करब  है  तर्क ||2||
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सोच समझ  कर लीजिये , जीवन  में  संकल्प |
कहीं पितामह भीष्म सम,फिर नहिं बचे विकल्प ||3||
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जीव जनम के संग ही , मौत जनम  भी  लेय |
जीव संग निसि दिन फिरै, भनक न लागन देय ||4||
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नुशाशन की रोपनी , घर- परिवार  से  होय |

विद्यालय में फूल-फलि, एक बिरिछ सम होय ||5||




Sunday, November 29, 2015

जिंदगी मौत


जिन्दगी मौत -----


जिन्दगी  मौत  का  ये  सिलसिला  पुराना है ,
एक  के   आते   ही   दूसरे   को  जाना है ||
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रिश्ते  और  नातों  में  हम बंधे  हुए तो क्या ,
तोड़  इस  बंधन  को  एक  दिन तो जाना है ||
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रस्म  व  रिवाजों  को  तोड़ना बहुत  मुश्किल ,
हाल  चाहे  जैसे  हों  हरहाल  में  निभाना है ||
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एक  अहसास से  ही   दिल  धड़क  उठता है ,
फिर भी दिल की धड़कन को सीने में दबाना है ||
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उपवनों की  शोभा  तो फूल  से  ही  होती  है ,
टूटकर   डाली    से   हार    बन  जाना  है ||
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मंजिलों  को  राहों  से  दूर  कर  नहीं  सकते ,
‘आज़ाद’  राहों  से  ही  मंजिलों  को  पाना है ||









Wednesday, November 25, 2015

मेरी रचनाओं का छायाचित्र


राम चंदर 'आज़ाद'
कवि एवं साहित्यकार 
पद-  हिंदी शिक्षक 
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़,झालावाड़ (राज.)
पिन -३२६५१२








Tuesday, November 24, 2015

बात सच थी ----

बात सच थी ----


बात सच थी मगर कहने में हम सकुचाये |
ना चाहकर  भी हमने  मंद मंद  मुस्काए|| 
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उनकी   तारीफ़  हमें   थोड़ी   सी  अजीब  लगी |
जिन्हें  हम  फूटी  आँखों   भी  कभी  नहीं भाए ||
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जिसने   परवाह    नहीं   की   कभी  जमाने  की |
वो   जमाने   की    सीख    देने    मेरे    घर  आये ||
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ये  कैसी  दोस्ती  है  जिन्दगी  संग   साँसों  की |
एक   के   रूठते   फिर    दूसरी   भी   चल   जाए ||
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जिसने  जीवन  में दोस्ती  की  कदर  ना जानी |
सच  में   आजाद  दोस्ती   की  वो  कसम  खाए ||






आमिर से

         आमिर से ----
कितना आसान था कहना –
कि हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
जबकि आप में मुल्क बसता है |
हर जवान ,बूढ़े ,बच्चे
आप के दिल में बसते हैं |
टीवी के स्क्रीन पर आपको देखकर
अपना काम छोड़कर आ धमकते हैं |
‘सत्यमेव जयते’ क्या मात्र बिजनेस था –
या सच्ची घटनाओं को उजागर कर
लोकप्रियता हासिल करना |
अथवा सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों पर
कुठाराघात कर महान बनना |
बड़ी ही योग्यता एवं बहादुरी के साथ
सच को समाज के सामने परोसना
क्या एक मात्र नाटक था
अथवा यह सब एक दिखावा था |
यह देश आपसे प्यार करता है
और आप कहते हैं कि
हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
चलिए कुछ समय के लिए मान लेते हैं कि
फिल्मों में दिखावा होता है न कि हकीकत
फिर भी –
फिल्म में आपके नकली रोने पर लोग रो देते हैं
और हँसने पर खिलखिला उठते हैं |
क्या आप को अपने मुल्क से
मोहब्बत नहीं है ? है न ---
फिर कैसे कह सकते हैं कि
हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
ज़रा दिल से सोचिये –
जिसमें भारत बसता है
जब आप यहाँ महफूज नहीं हैं तो
मेरा मानना है कि दुनिया का कोई मुल्क
आपको महफूज नहीं रख सकेगा |
वतन से प्रेम है तो वतन पर
विश्वास कीजिये ---वतन के साथ चलिए –
नहीं तो वही होगा
धोबी का कुत्ता घर का न घाट का-----