Followers
Wednesday, November 25, 2015
Tuesday, November 24, 2015
बात सच थी ----
बात सच थी ----
बात सच थी मगर कहने में हम सकुचाये |
*************************
उनकी तारीफ़ हमें थोड़ी सी अजीब लगी |
जिन्हें हम फूटी आँखों भी कभी नहीं भाए ||
*************************
जिसने परवाह नहीं की कभी जमाने की |
वो जमाने की सीख देने मेरे घर आये ||
*************************
ये कैसी दोस्ती है जिन्दगी संग साँसों की |
एक के रूठते फिर दूसरी भी चल जाए ||
*************************
जिसने जीवन में दोस्ती की कदर ना जानी |
सच में आजाद दोस्ती की वो कसम खाए ||
आमिर से
आमिर से ----
कितना आसान था कहना –
कि हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
जबकि आप में मुल्क बसता है |
आप के दिल में बसते हैं |
टीवी के स्क्रीन पर आपको देखकर
अपना काम छोड़कर आ धमकते हैं |
‘सत्यमेव जयते’ क्या मात्र बिजनेस था –
लोकप्रियता हासिल करना |
अथवा सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों पर
कुठाराघात कर महान बनना |
बड़ी ही योग्यता एवं बहादुरी के साथ
सच को समाज के सामने परोसना
क्या एक मात्र नाटक था
अथवा यह सब एक दिखावा था |
यह देश आपसे प्यार करता है
और आप कहते हैं कि
हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
चलिए कुछ समय के लिए मान लेते हैं कि
फिल्मों में दिखावा होता है न कि हकीकत
फिर भी –
फिल्म में आपके नकली रोने पर लोग रो देते हैं
और हँसने पर खिलखिला उठते हैं |
क्या आप को अपने मुल्क से
मोहब्बत नहीं है ? है न ---
फिर कैसे कह सकते हैं कि
हम अपने मुल्क में महफूज़ नहीं हैं |
ज़रा दिल से सोचिये –
जिसमें भारत बसता है
जब आप यहाँ महफूज नहीं हैं तो
मेरा मानना है कि दुनिया का कोई मुल्क
आपको महफूज नहीं रख सकेगा |
वतन से प्रेम है तो वतन पर
विश्वास कीजिये ---वतन के साथ चलिए –
नहीं तो वही होगा
धोबी का कुत्ता घर का न घाट का-----
Monday, November 23, 2015
धर्म प्रवचक
धर्म प्रवचक
देश के कोने-कोने में उपदेशक की भरमार है |
हर टीवी चैनल पर देखो ,बाबाओं की फ़ौज है |
खाने, पीने, सोने, बैठने सभी तरह से मौज है |
धरम-करम,मोह,माया का ऐसा सबक सिखाते हैं |
भोले-भाले भक्त जनों को अपना शिष्य बनाते हैं ||
भोले-भाले भक्त जनों को अपना शिष्य बनाते हैं ||
निर्बल और असहाय सह रहा फिर भी अत्याचार है ||
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||
मधुर वचन में कथा-वार्ता सबको रोज सुनाते हैं |
बाबाओं से मिलने खातिर टिकट ख़रीदे जाते हैं |
कोई तीसरा हाथ बताकर जनता को भरमाते हैं |
टोने-टोटके भांति-भांति के वे करतब बतलाते हैं ||
तब भी नहीं रोकते रुकता फ़ैल रहा व्यभिचार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||
कोई कंठहार बेंचता , कोई मूर्ति का व्यापारी |
जिसके धारण कर लेने से मिट जाती दुविधा सारी |
जनम कुंडली की पुस्तक का कोई बना है व्यापारी |
अपने-अपने भाग्य बनाने में अंधी दुनिया सारी ||
मोबाईल कंप्यूटर टीवी पर इनका खूब प्रचार है ||
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||
धर्मगुरु तो सभी धरम के एक कम सौ के फेर में |
आज चढ़ावे कितने चढ़ गए पड़े हुए इस फेर में |
माया मोह के उपदेशक ही माया मोह के फेर में |
ऐसे धर्म के पथप्रदर्शक ही खुद फँस रहे अंधेर में ||
ऐसे जन से भले की आशा करना ही बेकार है |
समझ नहीं आता जाने क्यों होता नहीं सुधार है ||
Sunday, November 22, 2015
सत्ताईस नक्षत्र
सत्ताईस नक्षत्र
कृतिका रोहिणी मृगशिरा हर कोई है ख़ास ||
हर कोई है ख़ास आर्द्रा पुनर्वसु अरु पुष्य |
अश्लेषा मघा की बरखा भावै सबही मनुष्य ||
कहता है 'आज़ाद' पूर्वाफाल्गुनी कितनी मस्त |
झूमत उत्तराफाल्गुनी संग जब आवत हस्त ||
चित्रा ने चित ले लियौ चातक भयौ उदास |
चातक को अब स्वाति से बची है थोड़ी आस ||
बची है थोड़ी आस विशाखा नहिं अनुराधा |
ज्येष्ठा मूल से चातक को बस मिलेगी बाँधा ||
कहता है 'आज़ाद' आ गयौ पूर्वाषाढा |
वाके पीछे आ धमक्यो तब उत्तराषाढ़ा ||
गोरी गीत सुनावती सावन आयौ तीज ||
सावन आयौ तीज धनिष्ठा अरु शतामिषा |
त्याग पूर्वाभाद्रपद दीजिये मन से इर्ष्या ||
कहता है 'आज़ाद' उत्तराभाद्रपद की कथनी |
कहत रेवती अश्विनी जस करनी वस् भरणी ||
Saturday, November 21, 2015
शाश्वत जीवन
शाश्वत जीवन
जीवन में कुछ मिल जाए या जीवन से कुछ छीन जाए |
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
वह देखो गिर रहीं पत्तियाँ टूट टूट कर पेड़ों से ,
नंगा पेड़ झुलस रहा है लू के गरम थपेड़ों से |
पतझड़ से जंगल नहीं वीरान हुआ करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
नदियाँ शाश्वत बहती रहतीं ,थकती नहीं कभी भी वे |
कल कल करती रहतीं ,रूकती नहीं कभी भी वे ||
उनका प्रबल वेग तो चट्टानों को मोड़ दिया करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
रोज रोज दाह से पीड़ित ,फिर भी मना नहीं कर सकता |
धूम्र रूप में आहें तजकर .शांत उसे होना है पड़ता |
फिर भी वह श्मशान देखिये ,कभी नहीं रोया करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
बादल उसे भले ही ढँक ले ,कुहरा चाहे चमक रोक ले |
शीत उसे ठिठुरन पैदा कर ,उसके ताप भले कम कर दे |
फिर भी रवि के उदय अस्त पर फर्क नहीं पड़ा करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
लाख लांछन आरोपित हों ,वह उनकी परवाह न करता |
अपने सत्कर्मो के बल पर , वह प्रतिपल आगे को बढ़ता |
वह सत्पथ पर चलने से, कभी नहीं डरा करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
Wednesday, November 4, 2015
कर्म की राह
कर्म की राह
पूजा मेरा कर्म नहीं है ,कर्म ही मेरी पूजा है |
सच कहता हूँ इससे बढ़कर और नहीं दूजा है |
इसी के बल पर मैंने अपना नाम कमाया है |
मेरे जीवन का चिराग बन इसने राह दिखाया है ||
![]() |
यही तो गांधी की लाठी बन सबके सम्मुख आया था |
यह सुभाष का साथी बन जर्मनी घूम कर आया था |
दलित मसीहा को इसने ही रस्ता नया दिखाया था |
नेहरु का यह रूप ग्रहण कर बच्चों के मन भाया था ||
बलिदानी झाँसी-रानी संग रण में धूम मचाया था |
हरिश्चंद को इसने ही सत्पथ का राह दिखाया था ||
इसी के कारण राघव ने बनवास सहर्ष निभाया था |
भगत इसी से प्रेरित हो फाँसी को गले लगाया था ||
शेरे दिल आजाद ने अंग्रेजों को खूब छकाया था ||
मैं भी उसी कर्म के पथ पर निकल पड़ा हूँ |
जिससे मैंने कुछ पल को विश्राम लिया था |
वह चिरपरचित राहें जिससे गहरा रिश्ता है |
जिसको मैंने जीवन का इक नाम दिया था ||
वही कर्म की डोर खींचती है अब मुझको |
जिससे प्रेम से बटकर के अंजाम दिया था |
उसी डगर पर आज जरुरत है चलने की |
जिससे देश प्रगति के पथ पर पुनः बढ़ सके ||
Subscribe to:
Posts (Atom)













