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Saturday, November 21, 2015

शाश्वत जीवन


शाश्वत जीवन 

जीवन में कुछ मिल जाए या जीवन से कुछ छीन जाए |
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||
वह देखो गिर रहीं पत्तियाँ टूट टूट कर पेड़ों से ,
नंगा पेड़ झुलस रहा है लू के गरम थपेड़ों से |
पतझड़ से जंगल नहीं वीरान हुआ करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

नदियाँ शाश्वत बहती रहतीं ,थकती नहीं कभी भी वे |
कल कल करती रहतीं ,रूकती नहीं कभी भी वे ||
उनका प्रबल वेग तो चट्टानों को मोड़ दिया करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

रोज रोज दाह से पीड़ित ,फिर भी मना नहीं कर सकता |
धूम्र रूप में आहें तजकर .शांत उसे होना है पड़ता |
फिर भी वह श्मशान देखिये ,कभी नहीं रोया करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

बादल उसे भले ही ढँक ले ,कुहरा चाहे चमक रोक ले |
शीत उसे ठिठुरन पैदा कर ,उसके ताप भले कम कर दे |
फिर भी रवि के उदय अस्त पर फर्क नहीं पड़ा करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||

लाख लांछन आरोपित हों ,वह उनकी परवाह न करता |
अपने सत्कर्मो के बल पर , वह प्रतिपल आगे को बढ़ता |
वह सत्पथ पर चलने से, कभी नहीं डरा करता है ||
फिर भी जीवन कभी नहीं विश्राम किया करता है ||



Wednesday, November 4, 2015

कर्म की राह


        कर्म की राह 

पूजा मेरा कर्म नहीं है ,कर्म ही मेरी पूजा है |
               सच कहता हूँ इससे बढ़कर और नहीं दूजा है |
इसी के बल पर मैंने अपना नाम कमाया है |
            मेरे जीवन का चिराग बन इसने राह दिखाया है ||


यही तो गांधी की लाठी बन सबके सम्मुख आया था |
            यह सुभाष का साथी बन जर्मनी घूम कर आया था |
दलित मसीहा को इसने ही रस्ता नया दिखाया था |
            नेहरु का यह रूप ग्रहण कर बच्चों के मन भाया था ||

बलिदानी झाँसी-रानी संग रण में धूम मचाया था |
           हरिश्चंद को इसने ही सत्पथ का राह दिखाया था ||
इसी के कारण राघव ने बनवास सहर्ष निभाया था |
           भगत इसी से प्रेरित हो फाँसी को गले लगाया था ||
शेरे दिल आजाद ने  अंग्रेजों को खूब छकाया  था ||

मैं भी उसी कर्म के पथ पर निकल पड़ा हूँ |
             जिससे मैंने कुछ पल को विश्राम लिया था |
वह चिरपरचित  राहें जिससे गहरा रिश्ता है |
             जिसको मैंने जीवन का इक नाम दिया था ||

वही कर्म की डोर खींचती है अब मुझको |
             जिससे प्रेम से बटकर के अंजाम दिया था |
उसी डगर पर आज जरुरत है चलने की |
             जिससे देश प्रगति के पथ पर पुनः बढ़ सके ||






Tuesday, November 3, 2015

महँगाई


          महँगाई
चूल्हे चौके चुप पड़े हैं ,
          चुप पड़ी कोने पतीली |
हाय रे ! महँगाई तूने,
          जेब कर दी सबकी ढीली ||
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प्यार बसता था कभी,
          जो आँखे थी काली व पीली |
इक झलक जब आज देखा ,
           हो रहीं थी लाल पीली ||
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सब्जियाँ कुछ सूखी बनती ,
          और कुछ बनती रसीली |
जो कभी थी सूखी थी बनती ,
           हो गयी वो भी रसीली ||
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पेट तो सूखा पड़ा है ,
           आँख से बहता है पानी |
आंसुओं को पोंछने से ,
           हो गयी है बाहें गीली ||
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सबकी मुँहबोली बनी है ,
           हाय! महँगाई छबीली |
शर्ट तो पहले थी ढीली ,
           कर गयी पतलून ढीली ||
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दिख रहे बाज़ार सूने ,
           और दुकाने सो रही हैं |
देखिये इसने तो कर दी ,
           हर किसी की बन्द बोली ||
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कौन समझाए इसे ,
          है नहीं सुनती किसी की |
क्या कहें 'आज़ाद' यह ,
          है बहुत जिद्दी व हठीली ||
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Monday, November 2, 2015

जाके मन को खेती भावै



जाके मन को खेती भावै |



जाके मन को खेती भावै |

सुमित कुदार, ज्ञान कि गैंती, बंजर  खोदि  बहावै ||

प्रगति  बीज ,खेत  मंह  डाले,  अंकुर  स्नेह उगावै ||

प्रेम नीर  से  करे  सिंचाई , तन  सम  खेत  बनावै ||

बाल पौध को रोजहि निरखत, तृण को नोच बहावै ||

बरसा ,धुप ,ठण्ड को रोकत , तनिक न धैर्य गंवावै||

कहि 'आजाद' संत की किरपा, देखि फसल हरसावै ||





Sunday, November 1, 2015

दिल में बसा लिया है




दिल में बसा लिया है------- 


दिल में बसा लिया है तो फिर साथ दीजिये |
यदि  ऐसा  नहीं  है  तो  हमें  माफ़ कीजिये ||
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माना की मुझसे आपको नहीं कोई सरोकार ,
फिर  भी तो  गैर  जैसे  न  बरताव  कीजिये ||
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यह प्यार  खिलौना  नहीं जो खेले चल दिए ,
रखकर के  दिल पे  हाथ  ज़रा गौर कीजिए ||
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दिल तोड़कर के तुझको मिलेगा नहीं सुकून ,
आखिर तू अपने दिल से ये सवाल कीजिये ||
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टूटे  हुए  रिश्ते  बड़ी  मुश्किल  से  हैं  जुड़ते ,
बीते  हुए  लम्हों  को  फिर  से याद कीजिये ||
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बहके  हुए  कदमों को रोकना नहीं मुश्किल ,
'आजाद'  एक  बार  फिर  से  पहल कीजिये ||
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Friday, October 30, 2015

इस जिंदगी में जिसने


इस जिन्दगी में जिसने----



इस जिन्दगी में जिसने, खोये कभी न आस |
सचमुच में  जिन्दगी में ,वो  ही  हुए  हैं पास ||

तनहाइयों में पड़कर,  मानी न  जिसने  हार ,
पहचान दे गए हैं , दु निया को अपनी  ख़ास ||

जो दोस्त से नहीं मगर किये दोस्ती से प्यार ,
उनको तो दोस्त कर नहीं सकते कभी निराश ||

मुश्किल में डगमगाए नहीं ,जिनके कभी कदम ,
हासिल किये हैं मंजिल ,सह करके  भूख-प्यास ||

बदकिस्मती भी  जिनको , करती  सदा  सलाम,
मुठ्ठी में बन्द  रखते , किस्मत  जो  अपने  पास ||

परवाह   जो   न  करते,  मिले   जीत  चाहे  हार ,
किस्मत भी ऐसे लोग  की , करती  सदा  तलाश ||

तन्हां  भी    होके   जिसने,   रोके   नहीं   कदम ,
मंजिल भी  आगे-पीछे , फिरती   है  उनके  पास ||

'आजाद'  गम में  जिसने,  सीखा   कभी न  रोना ,
मासूमियत के   लम्हें,  टिकते   न   उनके   पास ||





Tuesday, October 27, 2015

यह कैसा अभिशाप है


यह कैसा अभिशाप है ?

लता है हर साल ये रावण |
मरता नहीं कभी ये रावण |
अग्निदेव भी हतप्रभ दिखते,
असर न करता ताप है |
यह कैसा अभिशाप है ?
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आती है हर साल दीवाली ,
हर दिल में लेकर खुशहाली | 
फिर भी रोज सुनाई पड़ता ,
सीता का करुण विलाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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जलती है प्रतिवर्ष होलिका ,
रंगों में प्रतिबिम्ब होलिका |
अमर गीत फागुन है गाता ,
मस्ती का आलाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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सच्चाई के पीछे छिपकर ,
झूठ सदा चलता आया है |
हलचल -सा जो श्रवनित होता ,
उसका है पदचाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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पुष्प सदा उपवन में ही खिलेगा |
न्याय अदालत में ही मिलेगा |
यारों ! सच के निर्धारण का ,
यह कैसा परिमाप है ?
यह कैसा अभिशाप है ?
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उपदेशों का बाजारों गरम है |
पैसा -पूजा ,धरम ,करम है |
वल्कल वस्त्रों के पीछे अब ,
मंजनूपन का छाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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जिन्हें देश पर मरना चहिये,
वही देश को लूट रहे हैं |
श्वेत वस्त्र ,गाँधी की टोपी ,
सुरा सुंदरी ठाट हैं ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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