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Tuesday, October 20, 2015

ये अलग बात है

              ये अलग बात है 

कोशिशें मैं भी करता हूँ ,निकम्मों में जगह पाऊं |
ये अलग बात है मुझको नहीं स्थान मिल पाता ||

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सोचता मौन होकर मैं भी देखूँगा नजारों को ,
ये अलग बात है चुप साधना मुझको नहीं आता ||

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मंजिल-ए-कामयाबी की तमन्ना मैं भी रखता हूँ |
ये अलग बात है मुझसे वहाँ पहुँचा नहीं जाता ||

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लोग कहते हैं चेहरे से सच्चाई साफ़ दिखती है |
ये अलग बात है मुझसे नहीं चेहरा पढ़ा जाता ||

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हौंसला मैं भी रखता हूँ बहानेबाज़ी करने की ,
ये अलग बात है 'आजाद' मुझसे हो नहीं पाता ||
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Friday, October 16, 2015

मेरो पिय परदेश सिधारे |

मेरो पिय परदेश सिधारे |


मेरो पिय परदेश सिधारे |


सिसक सिसक कर भई बावरी , 
                ढूरकत  अँसुवन    धारे||

खान-पान रंचहु नहीं भावे, 
                आवत     याद    तिहारे ||

काम काज में मन नहिं लागै, 
                 संध्या    और     सकारे ||

रात-रात भर नींद न आवै ,
                  हो    जावत    भिनसारे ||

मन तन छोरि सकल जग नाचै, 
                 रहत   न    पास   हमारे ||

नहिं 'आजाद' मनहिं कछु भावै, 
                जगत  लगत  न पियारे ||











Tuesday, October 13, 2015

आज़ाद के चौकड़े



      आज़ाद के चौकड़े

गुरु से कपट ,मातु-पितु चोरी ,
    अरु  ऊपर  से सीना जोरी |नहिं आजाद पावहिं जग ठौर ,
    चाहे  छोरा  या  हो  छोरी ||
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गुरु से ज्ञान ,मातु से ममता ,
    अरु भाई से भुजबल क्षमता |
कहि 'आजाद' पितु से निर्भयता ,
    पत्नी से सृजन की क्षमता ||
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मन से बैर उपरि से खैर ,
    वा से बढ़िया समझहु गैर |
कहि 'आजाद' निश्छल मोहिं भावै,
    चाहे आपुन  या  हो गैर ||
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धन बिनु धनी ,ज्ञान बिनु ज्ञानी ,
    जस चमकत मटकी बिनु पानी |
कहि 'आजाद' ऐसहि जन जग में ,
    जानि  बूझि  करते  नादानी ||
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सूरज दिवस ,चन्द्र से रजनी ,
    जीवन खेल चले नित धरनी |
कहि 'आजाद' जो होहि महाजन ,
    फरक न उनके कथनी करनी ||

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Thursday, October 8, 2015

कौल के वास्ते


                                 कौल के वास्ते


कौल के वास्ते जाँ निछावर करें ,
         आजकल इस तरह के कहाँ लोग हैं ?
कहने को हम तुम्हारे घणी यार हैं ,
         वक्त पर काम आते कहाँ लोग हैं ?
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धर्म से धर्म लड़ते ये कैसा धरम ,
         धर्म को धर्म कहने में आती शरम,
जिस धरम से किसी का भला हो अगर ,
         आजकल उस धरम पर कहाँ लोग हैं ?
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प्यार में कसमे वादे तो ऐसे किये,
         जैसे जन्मों जनम तक न टूटेगा ये ,
एक झोंका जिसे तोड़कर चल दिया ,
         आज रिश्ते निभाते कहाँ लोग हैं ?

 इक घरोंदा बनाया था जो प्यार का ,
         प्यार के रंग में जिसको था हमने रंगा,
आग नफरत की उसमे लगी इस कदर ,
         आग ऐसी  बुझाते कहाँ लोग हैं ?
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मुझको मालूम नहीं कब मेरे हो गए ?
         उनको मालूम नहीं कब मैं उनका हुआ ?
जिसमे वादे कसम की जगह भी नहीं , 
         आज 'आज़ाद ' ऐसे कहाँ लोग हैं ?
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Tuesday, October 6, 2015

सच कहता हूँ

सच कहता हूँ -------

फिकर नहीं होती है जिनको ,जीने और मर जाने की |
फिकर नहीं होती है जिनको, कुछ खोने कुछ पाने की |
नहीं कभी ऐसे जन मुश्किल में घबराया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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जो समाज के ताने सुनकर भी परवाह नहीं करते हैं |
जो समाज के ठेकेदारों से भी तनिक नहीं डरते हैं |
वे समाज से एक दिवस स्वागत करवाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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कलम नहीं जिनकी रूकती है दहशत के औजारों से |
पर्दाफाश किया करते हैं अपने सत्य विचारों से |
वे समाज के प्रेरक बन सब दिल पर छाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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जो पर सेवा में अपना तन ,मन ,धन अर्पित करते हैं |
अत्याचार, अन्याय के आगे कभी नहीं जो झुकते हैं |
ऐसे जन की गौरव गाथा कविगण गाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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शोषित और उपेक्षित जन की जो लाठी बन जाते हैं |
निंदा और प्रशंसा को जो हँसकर गले लगाते हैं |
अपने जीवन के इक पल को कभी न जाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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विपदाओं सम परबत भी जिनके सम्मुख शर्माते हैं |
जिन्हें देख भय के सागर भी हाथ मीज पछताते हैं |
वे सत्य अहिंसा और शांति के पुष्प खिलाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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Saturday, October 3, 2015

कहने को एक पल में


कहने को एक पल में ....... 




कहने को एक पल में बन जाते सारे साथी ,
पर  साथ   देने  वाले  होते  हैं  कोई   कोई ॥1॥ 
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छाये हैं आसमां में बादल जो काले काले,
जल  बनके   बरसते  हैं  वे  मेघ कोई  कोई ॥2॥
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रणभूमि  में   होते  हैं  जाने   तमाम  लोग ,
पर  उनमें  शूरमा  तो  होते  हैं  कोई   कोई ॥3॥
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है  जान  मेरी  हाज़िर  तेरे  वास्ते  हरपल ,
पर  जान  देने  वाले  होते  हैं  कोई   कोई ॥4॥
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रोटी   तो   खा   रहे   हैं   छोटे -बड़े   सभी ,
मेहनत के बल पे रोटी खाते हैं कोई  कोई ॥5॥
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कहने को ये भी वो  भी सब दोस्त  हैं मेरे ,
पर दोस्ती के रिश्ते निभाते हैं कोई  कोई ॥6॥
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कविता सुना  रहे हैं  कविगण  यहाँ सभी ,
'आजाद' मगर उनको सुनते हैं कोई  कोई ॥7॥


    


Thursday, October 1, 2015

मुखौटे वाले


मुखौटेवाले 

इस ज़माने में लोग कितने मुखौटेवाले,
बदल के रोज मुखौटे निकलते देखा है ||

कभी इंसानियत के रंग की चादर ओढ़े ,
भरी महफ़िल में शान से मचलते देखा है ||

अनगिनत हसरतें दिल में समेटे वे अपने ,
नज़र में कातिलाना शाम ढलते देखा है ||

गुरूर उनको है अपने  ज़मीर पर इतना ,
न जाने कितनी बार जिसको बिकते देखा है ||

चन्द मुस्कराहटों से खुशनसीब लगते हैं ,
असलियत आँख से आँसू झलकते देखा है ||

अपनी अह्सानियत का रोब जताते फिरते ,
गैरों की नज़रों में 'आज़ाद 'गिरते देखा है ||