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Thursday, October 8, 2015

कौल के वास्ते


                                 कौल के वास्ते


कौल के वास्ते जाँ निछावर करें ,
         आजकल इस तरह के कहाँ लोग हैं ?
कहने को हम तुम्हारे घणी यार हैं ,
         वक्त पर काम आते कहाँ लोग हैं ?
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धर्म से धर्म लड़ते ये कैसा धरम ,
         धर्म को धर्म कहने में आती शरम,
जिस धरम से किसी का भला हो अगर ,
         आजकल उस धरम पर कहाँ लोग हैं ?
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प्यार में कसमे वादे तो ऐसे किये,
         जैसे जन्मों जनम तक न टूटेगा ये ,
एक झोंका जिसे तोड़कर चल दिया ,
         आज रिश्ते निभाते कहाँ लोग हैं ?

 इक घरोंदा बनाया था जो प्यार का ,
         प्यार के रंग में जिसको था हमने रंगा,
आग नफरत की उसमे लगी इस कदर ,
         आग ऐसी  बुझाते कहाँ लोग हैं ?
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मुझको मालूम नहीं कब मेरे हो गए ?
         उनको मालूम नहीं कब मैं उनका हुआ ?
जिसमे वादे कसम की जगह भी नहीं , 
         आज 'आज़ाद ' ऐसे कहाँ लोग हैं ?
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Tuesday, October 6, 2015

सच कहता हूँ

सच कहता हूँ -------

फिकर नहीं होती है जिनको ,जीने और मर जाने की |
फिकर नहीं होती है जिनको, कुछ खोने कुछ पाने की |
नहीं कभी ऐसे जन मुश्किल में घबराया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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जो समाज के ताने सुनकर भी परवाह नहीं करते हैं |
जो समाज के ठेकेदारों से भी तनिक नहीं डरते हैं |
वे समाज से एक दिवस स्वागत करवाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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कलम नहीं जिनकी रूकती है दहशत के औजारों से |
पर्दाफाश किया करते हैं अपने सत्य विचारों से |
वे समाज के प्रेरक बन सब दिल पर छाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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जो पर सेवा में अपना तन ,मन ,धन अर्पित करते हैं |
अत्याचार, अन्याय के आगे कभी नहीं जो झुकते हैं |
ऐसे जन की गौरव गाथा कविगण गाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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शोषित और उपेक्षित जन की जो लाठी बन जाते हैं |
निंदा और प्रशंसा को जो हँसकर गले लगाते हैं |
अपने जीवन के इक पल को कभी न जाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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विपदाओं सम परबत भी जिनके सम्मुख शर्माते हैं |
जिन्हें देख भय के सागर भी हाथ मीज पछताते हैं |
वे सत्य अहिंसा और शांति के पुष्प खिलाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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Saturday, October 3, 2015

कहने को एक पल में


कहने को एक पल में ....... 




कहने को एक पल में बन जाते सारे साथी ,
पर  साथ   देने  वाले  होते  हैं  कोई   कोई ॥1॥ 
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छाये हैं आसमां में बादल जो काले काले,
जल  बनके   बरसते  हैं  वे  मेघ कोई  कोई ॥2॥
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रणभूमि  में   होते  हैं  जाने   तमाम  लोग ,
पर  उनमें  शूरमा  तो  होते  हैं  कोई   कोई ॥3॥
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है  जान  मेरी  हाज़िर  तेरे  वास्ते  हरपल ,
पर  जान  देने  वाले  होते  हैं  कोई   कोई ॥4॥
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रोटी   तो   खा   रहे   हैं   छोटे -बड़े   सभी ,
मेहनत के बल पे रोटी खाते हैं कोई  कोई ॥5॥
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कहने को ये भी वो  भी सब दोस्त  हैं मेरे ,
पर दोस्ती के रिश्ते निभाते हैं कोई  कोई ॥6॥
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कविता सुना  रहे हैं  कविगण  यहाँ सभी ,
'आजाद' मगर उनको सुनते हैं कोई  कोई ॥7॥


    


Thursday, October 1, 2015

मुखौटे वाले


मुखौटेवाले 

इस ज़माने में लोग कितने मुखौटेवाले,
बदल के रोज मुखौटे निकलते देखा है ||

कभी इंसानियत के रंग की चादर ओढ़े ,
भरी महफ़िल में शान से मचलते देखा है ||

अनगिनत हसरतें दिल में समेटे वे अपने ,
नज़र में कातिलाना शाम ढलते देखा है ||

गुरूर उनको है अपने  ज़मीर पर इतना ,
न जाने कितनी बार जिसको बिकते देखा है ||

चन्द मुस्कराहटों से खुशनसीब लगते हैं ,
असलियत आँख से आँसू झलकते देखा है ||

अपनी अह्सानियत का रोब जताते फिरते ,
गैरों की नज़रों में 'आज़ाद 'गिरते देखा है || 

                


Sunday, September 27, 2015

आज हर शख्स को यह याद दिलाना होगा


वतन के  वास्ते


आज हर शख्स को यह याद दिलाना होगा |
वतन के  वास्ते  सर  अपना  कटाना होगा ||
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लगी  है  जंग  जो  शमसीर  और  ढालों  पर ,
अब उन्हें फिर से माज करके चमकाना होगा ||
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नेक  लगते  नहीं  अब   उनके   इरादे  शायद ,
उनके माफिक सबक अब हमको सिखाना  होगा ||
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धर्म  के  नाम  पर  जेहाद  जो  चलाते  हैं ,
अब उन्हें धर्म की परिभाषा समझाना होगा ||
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कदम बहके हैं जिनकी मंजिलों की राहों से ,
अब  उन्हें  एकता  की  राह  में लाना होगा ||
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कसम 'आजाद' की इस मातृभूमि के खातिर ,
हर एक शख्स  को अब  सामने  आना  होगा ||


Saturday, September 26, 2015

वाक् संयम

वाक् संयम 

जहाँ लोग बोलते हों ज्यादा ,
वहाँ चुप रहना ही अच्छा है |
तुम बोलोगे कौन सुनेगा ?
सो चुप रहना ही अच्छा है ||


पहले लोगों की बात सुनो ,
उनको बातों का माप करो |
फिर जो कुछ तुमको कहना है ,
मन से पूछो क्या अच्छा है ?

जिह्वा पर संयम रखना भी ,
सब लोगों को है नहीं आता |
क्योंकि यह एक कठिन संयम ,
बिरलों को ही लगता अच्छा है ||

जीवन में यदि कुछ करना है ,
तो संयम से रहना होगा ||
जीवन को सफल बनाने में ,
कष्टों से लड़ना अच्छा है ||

मौन है सबसे बड़ी तपस्या ,
ऋषि ,मुनियों को लगती प्यारी है |
योग,साधना ,पूजा का छण,
उसका संग लगता अच्छा है ||





Friday, September 25, 2015

काव्यगोष्ठी


काव्य-गोष्ठी  दिनांक- 22-09-2015
हिंदी पखवाडा, जवाहर नवोदय विद्यालय  पचपहाड़
जिला -झालावाड़ (राज.)
प्रमुख कवि-
बाएं से दायें - श्री रमा कान्त शर्मा ,पी.जी.टी. (रसायन शास्त्र ), श्री मोईनुद्दीन जी ,श्री राजेश पुरोहित ,श्री राम सिंह प्राचार्य , मैडम गीता पी.जी.टी.(हिंदी) , श्री राजेंद्र आचार्य ,श्री रामचंदर 'आज़ाद ' श्री राम प्रीत आनंद




निगाहें बोलती हैं प्रेम और नफरत की भाषाएँ |

हमें बस उसको सुनने और समझने की जरुरत है ||