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Tuesday, October 6, 2015

सच कहता हूँ

सच कहता हूँ -------

फिकर नहीं होती है जिनको ,जीने और मर जाने की |
फिकर नहीं होती है जिनको, कुछ खोने कुछ पाने की |
नहीं कभी ऐसे जन मुश्किल में घबराया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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जो समाज के ताने सुनकर भी परवाह नहीं करते हैं |
जो समाज के ठेकेदारों से भी तनिक नहीं डरते हैं |
वे समाज से एक दिवस स्वागत करवाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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कलम नहीं जिनकी रूकती है दहशत के औजारों से |
पर्दाफाश किया करते हैं अपने सत्य विचारों से |
वे समाज के प्रेरक बन सब दिल पर छाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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जो पर सेवा में अपना तन ,मन ,धन अर्पित करते हैं |
अत्याचार, अन्याय के आगे कभी नहीं जो झुकते हैं |
ऐसे जन की गौरव गाथा कविगण गाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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शोषित और उपेक्षित जन की जो लाठी बन जाते हैं |
निंदा और प्रशंसा को जो हँसकर गले लगाते हैं |
अपने जीवन के इक पल को कभी न जाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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विपदाओं सम परबत भी जिनके सम्मुख शर्माते हैं |
जिन्हें देख भय के सागर भी हाथ मीज पछताते हैं |
वे सत्य अहिंसा और शांति के पुष्प खिलाया करते हैं ||
सच कहता हूँ ऐसे जन इतिहास बनाया करते हैं ||
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Saturday, October 3, 2015

कहने को एक पल में


कहने को एक पल में ....... 




कहने को एक पल में बन जाते सारे साथी ,
पर  साथ   देने  वाले  होते  हैं  कोई   कोई ॥1॥ 
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छाये हैं आसमां में बादल जो काले काले,
जल  बनके   बरसते  हैं  वे  मेघ कोई  कोई ॥2॥
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रणभूमि  में   होते  हैं  जाने   तमाम  लोग ,
पर  उनमें  शूरमा  तो  होते  हैं  कोई   कोई ॥3॥
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है  जान  मेरी  हाज़िर  तेरे  वास्ते  हरपल ,
पर  जान  देने  वाले  होते  हैं  कोई   कोई ॥4॥
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रोटी   तो   खा   रहे   हैं   छोटे -बड़े   सभी ,
मेहनत के बल पे रोटी खाते हैं कोई  कोई ॥5॥
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कहने को ये भी वो  भी सब दोस्त  हैं मेरे ,
पर दोस्ती के रिश्ते निभाते हैं कोई  कोई ॥6॥
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कविता सुना  रहे हैं  कविगण  यहाँ सभी ,
'आजाद' मगर उनको सुनते हैं कोई  कोई ॥7॥


    


Thursday, October 1, 2015

मुखौटे वाले


मुखौटेवाले 

इस ज़माने में लोग कितने मुखौटेवाले,
बदल के रोज मुखौटे निकलते देखा है ||

कभी इंसानियत के रंग की चादर ओढ़े ,
भरी महफ़िल में शान से मचलते देखा है ||

अनगिनत हसरतें दिल में समेटे वे अपने ,
नज़र में कातिलाना शाम ढलते देखा है ||

गुरूर उनको है अपने  ज़मीर पर इतना ,
न जाने कितनी बार जिसको बिकते देखा है ||

चन्द मुस्कराहटों से खुशनसीब लगते हैं ,
असलियत आँख से आँसू झलकते देखा है ||

अपनी अह्सानियत का रोब जताते फिरते ,
गैरों की नज़रों में 'आज़ाद 'गिरते देखा है || 

                


Sunday, September 27, 2015

आज हर शख्स को यह याद दिलाना होगा


वतन के  वास्ते


आज हर शख्स को यह याद दिलाना होगा |
वतन के  वास्ते  सर  अपना  कटाना होगा ||
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लगी  है  जंग  जो  शमसीर  और  ढालों  पर ,
अब उन्हें फिर से माज करके चमकाना होगा ||
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नेक  लगते  नहीं  अब   उनके   इरादे  शायद ,
उनके माफिक सबक अब हमको सिखाना  होगा ||
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धर्म  के  नाम  पर  जेहाद  जो  चलाते  हैं ,
अब उन्हें धर्म की परिभाषा समझाना होगा ||
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कदम बहके हैं जिनकी मंजिलों की राहों से ,
अब  उन्हें  एकता  की  राह  में लाना होगा ||
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कसम 'आजाद' की इस मातृभूमि के खातिर ,
हर एक शख्स  को अब  सामने  आना  होगा ||


Saturday, September 26, 2015

वाक् संयम

वाक् संयम 

जहाँ लोग बोलते हों ज्यादा ,
वहाँ चुप रहना ही अच्छा है |
तुम बोलोगे कौन सुनेगा ?
सो चुप रहना ही अच्छा है ||


पहले लोगों की बात सुनो ,
उनको बातों का माप करो |
फिर जो कुछ तुमको कहना है ,
मन से पूछो क्या अच्छा है ?

जिह्वा पर संयम रखना भी ,
सब लोगों को है नहीं आता |
क्योंकि यह एक कठिन संयम ,
बिरलों को ही लगता अच्छा है ||

जीवन में यदि कुछ करना है ,
तो संयम से रहना होगा ||
जीवन को सफल बनाने में ,
कष्टों से लड़ना अच्छा है ||

मौन है सबसे बड़ी तपस्या ,
ऋषि ,मुनियों को लगती प्यारी है |
योग,साधना ,पूजा का छण,
उसका संग लगता अच्छा है ||





Friday, September 25, 2015

काव्यगोष्ठी


काव्य-गोष्ठी  दिनांक- 22-09-2015
हिंदी पखवाडा, जवाहर नवोदय विद्यालय  पचपहाड़
जिला -झालावाड़ (राज.)
प्रमुख कवि-
बाएं से दायें - श्री रमा कान्त शर्मा ,पी.जी.टी. (रसायन शास्त्र ), श्री मोईनुद्दीन जी ,श्री राजेश पुरोहित ,श्री राम सिंह प्राचार्य , मैडम गीता पी.जी.टी.(हिंदी) , श्री राजेंद्र आचार्य ,श्री रामचंदर 'आज़ाद ' श्री राम प्रीत आनंद




निगाहें बोलती हैं प्रेम और नफरत की भाषाएँ |

हमें बस उसको सुनने और समझने की जरुरत है ||

Saturday, September 19, 2015

मैं और वह

       

      मैं और वह 

मैंने अपना फ़र्ज निभाया ।
उसने अपना फ़र्ज निभाया। 
फर्क इतना ही था-

मैं उसे समझ नहीं पाया । 
वह मुझे समझ नहीं पाई। 
क्योंके हम दोनों मौन थे ।। 

उसने मुझको लड़ाया ।
मैंने उसको लड़ाया । 
परन्तु नतीजा यह हुआ कि-
न उसने हार खाई ।     
 मैंने हार खाई  ।         
क्योंके हम दोनों पहलवान थे ॥

मैंने उसको रुलाया ।
उसने मुझको रुलाया ।
और बाद में -
उसने मेरे आँसू पोंछे 
मैंने उसके  आँसू पोंछे 
क्योंकि हम दोनों दोस्त थे 

मैं उसे देख मुस्काया 
वह मुझे मुस्काई 
मैंने उसको आँख मारी । 
उसने मुझको आँख मारी । 
परन्तु -
मैं कुछ कर न सका । 
क्योंकि मैं बाहर था । 
वह अन्दर थी । 
वो कोई और नहीं ,
आईने में दिखती मेरी छाया थी ।।