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Saturday, September 19, 2015

मैं और वह

       

      मैं और वह 

मैंने अपना फ़र्ज निभाया ।
उसने अपना फ़र्ज निभाया। 
फर्क इतना ही था-

मैं उसे समझ नहीं पाया । 
वह मुझे समझ नहीं पाई। 
क्योंके हम दोनों मौन थे ।। 

उसने मुझको लड़ाया ।
मैंने उसको लड़ाया । 
परन्तु नतीजा यह हुआ कि-
न उसने हार खाई ।     
 मैंने हार खाई  ।         
क्योंके हम दोनों पहलवान थे ॥

मैंने उसको रुलाया ।
उसने मुझको रुलाया ।
और बाद में -
उसने मेरे आँसू पोंछे 
मैंने उसके  आँसू पोंछे 
क्योंकि हम दोनों दोस्त थे 

मैं उसे देख मुस्काया 
वह मुझे मुस्काई 
मैंने उसको आँख मारी । 
उसने मुझको आँख मारी । 
परन्तु -
मैं कुछ कर न सका । 
क्योंकि मैं बाहर था । 
वह अन्दर थी । 
वो कोई और नहीं ,
आईने में दिखती मेरी छाया थी ।। 










               
          

        
           

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