मैं और वह
मैंने अपना फ़र्ज निभाया ।
उसने अपना फ़र्ज निभाया।
फर्क इतना ही था-
मैं उसे समझ नहीं पाया ।
वह मुझे समझ नहीं पाई।
क्योंके हम दोनों मौन थे ।।
उसने मुझको लड़ाया ।
मैंने उसको लड़ाया ।
परन्तु नतीजा यह हुआ कि-
न उसने हार खाई ।
न मैंने हार खाई ।
क्योंके हम दोनों पहलवान थे ॥
मैंने उसको रुलाया ।
उसने मुझको रुलाया ।
और बाद में -
उसने मेरे आँसू पोंछे ।
मैंने उसके आँसू पोंछे ।
क्योंकि हम दोनों दोस्त थे ।।
मैं उसे देख मुस्काया ।
वह मुझे मुस्काई ।
मैंने उसको आँख मारी ।
उसने मुझको आँख मारी ।
परन्तु -
मैं कुछ कर न सका ।
क्योंकि मैं बाहर था ।
वह अन्दर थी ।
वो कोई और नहीं ,
आईने में दिखती मेरी छाया थी ।।


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