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Wednesday, January 6, 2016

हे भारत के शेरे वीर

                   हे भारत के शेरे वीर !!!


जंग लग गए अस्त्र-शस्त्र में ,
          मंद पड़ गयी क्या शमसीर ?
कब तक मौन   रहोगे प्रहरी ,
          भारत अब हो रहा   अधीर ||

जुल्मिस्तान के जुल्म सहोगे ,
         और रखोगे  कब  तक  धीर ,
गर्व चूर कर दो अब उसका ,
          हे    भारत   के   शेरे  वीर !!

ना जाने   इतराय   रहा क्यूँ ,
         फुदक रहा   मेढक   के जैसे ,
अब तो सबक सिखाना होगा ,
          ऐसे    वैसे    चाहे    जैसे ||

कायरता  से  बाज  न  आता ,
         छिप-छिपकर वह शोर मचाता ,
मगर   सामने   आने  से  वह ,
         गीदड़ सम छिपता  कतराता ||

उसे दिखा दो उसकी सूरत ,
         ऐ  भारत  के  सिंह   सपूत |
कभी न फिर पीछे मुड़ देखे ,
         वह कायर और जुल्मी धूर्त ||

कवि -राम चंदर 'आजाद'
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़ ,
जिला- झालावाड़ (राज.)



            

    

Monday, January 4, 2016

सबसे बड़ा धर्म

   
 सबसे बड़ा धर्म

काश अगर कोई सुन लेता ,
       गिरिजा ,गुरुद्वारे की बात |  

बम्म धमाके नहीं गूंजते ,
      मंदिर मस्जिद में दिन रात ||

मंदिर की घंटी दिला रही ,
      भजन  कीर्तन   की  यादें |
मस्जिद की नमाज कर रही ,
      अल्लाह से अपनी फरियादें ||

गीता हमको कर्म सिखाती ,
      गुरुग्रंथ  से  मिलता ज्ञान |
सदा सत्य पर चलो साथियों ,
      सबक सिखाती सदा कुरान ||

सबसे बड़ा धरम परसेवा ,
      यह है सब  धर्मों की जान |
जो इसको अपना लेता है ,
      वह  कहलाता श्रेष्ठ महान ||





Friday, January 1, 2016

वह देश हमारा भारत है

वह देश हमारा भारत है

जिस देश की माटी की खुशबू से सुरभित यह बचपन है|
वह देश हमारा  भारत है जिसे  शत शत बार नमन है ||

जहाँ नदियों में पानी अमृत बन सबको जीवन  देता है |
जहाँ परबत सीना तान खड़ा सीमा  पर  पहरा देता है |
जिसके चरण चूमने आतुर  नतमस्तक  हुआ गगन है ||

जहाँ  ऋषि-मुनी , साधू-संतों  की वाणी  में अमृत है |
जिसके उपदेशों की  मिठास जैसे  शक्कर  में घृत है |
जिसके कारण  उनका  स्वागत  होता  अभिनन्दन है ||

जहाँ सत्य,अहिंसा संबल है तो ऐक्य सभी का बल है |
जहाँ क्षमा, दया, करुणा जैसे गंगा-युमना का जल है |
जिसके कीर्ति विजय की गाथा शीतल मलय पवन है ||

जहाँ धर्म धर्म से बातें करते नहीं अधर्म  कोई हैं सहते |
जहाँ गीता और कुरान परस्पर मानवता के पुतले गढ़ते |
जिसके मंदिर ,मस्जिद ,गुरूद्वारे  गाते  गीत भजन हैं ||

जहाँ उपवन में खुशहाली है तो  खेतों में  हरियाली है |
जहाँ प्रकृति भी परिधान पहन दिखती बहु रंगोवाली है |
जिसकी  सुन्दरता को  लखकर  कोयल हुई  मगन है ||

जहाँ ऊषा अभिनन्दन करती है ,नित्य लालिमापन से |
जहाँ सूरज का सम्बन्ध  जुड़ा है लोगों  के जीवन से |
जिसकी महक से पूरित  होकर  हँसते  धरा-गगन हैं ||

जहाँ उगलती सोना-चांदी ऐसी यहाँ  की माटी है |
जहाँ चाँद को चंदा मामा कहने की  परिपाटी है |
ऐसा देश जो सकल विश्व का छूता अन्तःमन है ||




Wednesday, December 30, 2015

नववर्ष मंगलमय हो


नववर्ष मंगल हो ........

नई उमंगें ,नई तरंगे लेकर संग में हर्ष |
खुशियों का संदेसा लेकर आया है नववर्ष ||

नाचें   गायें ,   धूम   मचाएं ,
एक साथ मिल ख़ुशी मनाएं |
आशाओं  के दीप जले , हो मंगलमय नववर्ष || खुशियों का ....

नई  चेतना ,  नई  कल्पना ,
नई सृष्टि का लेकर सपना |
स्थापित हो मानवता का एक नया प्रतिदर्श || खुशियों का ....

विगत वर्ष की बातें तजकर ,
सपने नए बुने हम मिलकर |
देकर ख़ुशी ,ख़ुशी हम पायें  ले संकल्प सहर्ष || खुशियों का ....

जाति, धर्म से ऊपर उठकर ,
देश- प्रेम  की डोर पकड़कर |
औरों के हित जीना सीखें करें प्रगति संघर्ष || खुशियों का ....






Saturday, December 26, 2015

फोटो ग्राम्य दर्पण


यह मेरी कहानी संग्रह की पुस्तक 'ग्राम्य-दर्पण 'है जो अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है जिसमे कुल 25 कहानियाँ हैं |





मैं परदेशी यह देश न भावै |


मैं परदेशी यह देश न भावै |


मैं परदेशी यह देश न भावै |


अपना अपना  जेहि को  समझा वो मारन को धावै ||

हँसना चलना जेहि सिखायौ वहि अब मोहि रुलावै || 

स्वारथ बस सब आपन बोलत फेरि न सम्मुख आवै ||

प्रेम फाँस निकसै नहिं देवै उलझि- उलझि रहि जावै ||
 
माया मोह ने ऐसो बाँध्यौ  कछू  समुझि नहिं आवै ||

कहि ‘आजाद’ रूठ्यौ परदेशी  अपन देश को सिधावै ||


Wednesday, December 23, 2015

बुरे बखत कोई काम ना आवै |





बुरे बखत कोई काम ना आवै |

ब तक  मछरी  पानी  भीतर  सब संग धूम मचावै |

जैसहि  जाल  बीच  है  फँसती  छोडि  सबै भगि जावै ||***********************************

घायल  हरिना  वन -वन  भागै  कतहूँ ठौर नहिं पावै |

उसके रकत  खुदहि   नावक   को हरिना तक पहुंचावै ||

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 संगी - साथी   मारग   बदलत  बात  करत  सकुचावै |

कछु  कहने   से   पहले  ही  वह  अपनी  बिथा  सुनावै ||

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हीं मदद नहीं माँगहि हमसों मनहिं मनहिं घबरावै |

कहि 'आजाद' ऐसो समया  मा मन मिसरी नहिं भावै ||