मुखौटेवाले
इस ज़माने में लोग कितने मुखौटेवाले,
कभी इंसानियत के रंग की चादर ओढ़े ,
भरी महफ़िल में शान से मचलते देखा है ||

अनगिनत हसरतें दिल में समेटे वे अपने ,



नज़र में कातिलाना शाम ढलते देखा है ||
गुरूर उनको है अपने ज़मीर पर इतना ,
न जाने कितनी बार जिसको बिकते देखा है ||
चन्द मुस्कराहटों से खुशनसीब लगते हैं ,
असलियत आँख से आँसू झलकते देखा है ||
अपनी अह्सानियत का रोब जताते फिरते ,
गैरों की नज़रों में 'आज़ाद 'गिरते देखा है ||
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