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Thursday, October 1, 2015

मुखौटे वाले


मुखौटेवाले 

इस ज़माने में लोग कितने मुखौटेवाले,
बदल के रोज मुखौटे निकलते देखा है ||

कभी इंसानियत के रंग की चादर ओढ़े ,
भरी महफ़िल में शान से मचलते देखा है ||

अनगिनत हसरतें दिल में समेटे वे अपने ,
नज़र में कातिलाना शाम ढलते देखा है ||

गुरूर उनको है अपने  ज़मीर पर इतना ,
न जाने कितनी बार जिसको बिकते देखा है ||

चन्द मुस्कराहटों से खुशनसीब लगते हैं ,
असलियत आँख से आँसू झलकते देखा है ||

अपनी अह्सानियत का रोब जताते फिरते ,
गैरों की नज़रों में 'आज़ाद 'गिरते देखा है || 

                


Sunday, September 27, 2015

आज हर शख्स को यह याद दिलाना होगा


वतन के  वास्ते


आज हर शख्स को यह याद दिलाना होगा |
वतन के  वास्ते  सर  अपना  कटाना होगा ||
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लगी  है  जंग  जो  शमसीर  और  ढालों  पर ,
अब उन्हें फिर से माज करके चमकाना होगा ||
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नेक  लगते  नहीं  अब   उनके   इरादे  शायद ,
उनके माफिक सबक अब हमको सिखाना  होगा ||
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धर्म  के  नाम  पर  जेहाद  जो  चलाते  हैं ,
अब उन्हें धर्म की परिभाषा समझाना होगा ||
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कदम बहके हैं जिनकी मंजिलों की राहों से ,
अब  उन्हें  एकता  की  राह  में लाना होगा ||
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कसम 'आजाद' की इस मातृभूमि के खातिर ,
हर एक शख्स  को अब  सामने  आना  होगा ||


Saturday, September 26, 2015

वाक् संयम

वाक् संयम 

जहाँ लोग बोलते हों ज्यादा ,
वहाँ चुप रहना ही अच्छा है |
तुम बोलोगे कौन सुनेगा ?
सो चुप रहना ही अच्छा है ||


पहले लोगों की बात सुनो ,
उनको बातों का माप करो |
फिर जो कुछ तुमको कहना है ,
मन से पूछो क्या अच्छा है ?

जिह्वा पर संयम रखना भी ,
सब लोगों को है नहीं आता |
क्योंकि यह एक कठिन संयम ,
बिरलों को ही लगता अच्छा है ||

जीवन में यदि कुछ करना है ,
तो संयम से रहना होगा ||
जीवन को सफल बनाने में ,
कष्टों से लड़ना अच्छा है ||

मौन है सबसे बड़ी तपस्या ,
ऋषि ,मुनियों को लगती प्यारी है |
योग,साधना ,पूजा का छण,
उसका संग लगता अच्छा है ||





Friday, September 25, 2015

काव्यगोष्ठी


काव्य-गोष्ठी  दिनांक- 22-09-2015
हिंदी पखवाडा, जवाहर नवोदय विद्यालय  पचपहाड़
जिला -झालावाड़ (राज.)
प्रमुख कवि-
बाएं से दायें - श्री रमा कान्त शर्मा ,पी.जी.टी. (रसायन शास्त्र ), श्री मोईनुद्दीन जी ,श्री राजेश पुरोहित ,श्री राम सिंह प्राचार्य , मैडम गीता पी.जी.टी.(हिंदी) , श्री राजेंद्र आचार्य ,श्री रामचंदर 'आज़ाद ' श्री राम प्रीत आनंद




निगाहें बोलती हैं प्रेम और नफरत की भाषाएँ |

हमें बस उसको सुनने और समझने की जरुरत है ||

Saturday, September 19, 2015

मैं और वह

       

      मैं और वह 

मैंने अपना फ़र्ज निभाया ।
उसने अपना फ़र्ज निभाया। 
फर्क इतना ही था-

मैं उसे समझ नहीं पाया । 
वह मुझे समझ नहीं पाई। 
क्योंके हम दोनों मौन थे ।। 

उसने मुझको लड़ाया ।
मैंने उसको लड़ाया । 
परन्तु नतीजा यह हुआ कि-
न उसने हार खाई ।     
 मैंने हार खाई  ।         
क्योंके हम दोनों पहलवान थे ॥

मैंने उसको रुलाया ।
उसने मुझको रुलाया ।
और बाद में -
उसने मेरे आँसू पोंछे 
मैंने उसके  आँसू पोंछे 
क्योंकि हम दोनों दोस्त थे 

मैं उसे देख मुस्काया 
वह मुझे मुस्काई 
मैंने उसको आँख मारी । 
उसने मुझको आँख मारी । 
परन्तु -
मैं कुछ कर न सका । 
क्योंकि मैं बाहर था । 
वह अन्दर थी । 
वो कोई और नहीं ,
आईने में दिखती मेरी छाया थी ।। 










               
          

        
           

नवोदय नेशनल अवार्ड 2005

नवोदय विद्यालय समिति 
राष्ट्रीय समागम समारोह -2005
हिंदी शिक्षक श्री रामचंदर 'आज़ाद' को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करते मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह जी एवम् आयुक्त नवोदय विद्यालय समिति  श्री ओ.एन.सिंह जी 








Tuesday, September 15, 2015

जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |


जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ 

जी आपने जो भी कहा 
सच ही कहा -
पुस्तकों के ढेर में ,
अपने को घिरा पाता हूँ |
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |

बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||
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दोस्ती है दुश्मनी भी ,
पुस्तकों के संग फिर भी ,
नीद निशि का चैन दिन का ,
हँस-हँसकर लुटाता हूँ |
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |
बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||
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दंभ, द्वेष ,छल-कपट के हटकर ,
कर्म क्षेत्र में डटकर ,
सौम्य,साम्य ,संपन्न ,समुन्नत
के पथ को अपनाता हूँ ||
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |
बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||
*****************
नहीं कर्म में शर्म है कोई ,
जीवन का मेरे मर्म यही ,
मानव की मानवता को में ,
लिख-लिखकर समझाता हूँ ||
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |
बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||
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ज्ञान दीप के किरण-पुंज से ,
अन्तस्थल में व्याप्त कालिमा ,
हलके-हलके ,धीरे-धीरे ,
रगड़-रगड़ चमकाता हूँ ||
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |
बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||
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पेन-पेन्सिल और डस्टर डंडे ,
ये ही मेरे हैं हथकंडे ,
मैं बनकर पुस्तक का साथी ,
साथ-साथ इठलाता हूँ ||
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |
बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||
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जाति, धर्म व राग-द्वेष से हटकर ,
कर्त्तव्य मार्ग पर डटकर ,
समता, ममता ,अस्तेयता का ,
सुन्दर पुष्प खिलाता हूँ ||
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |
बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||
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मन में सागर-सी लहरें हैं ,
पर्वत-सी अडिगता लिए हुए ,
खड़ा हुआ मैं -
झूम-झूमकर अपना पाठ पढाता हूँ ||
जी हाँ, मैं अध्यापक हूँ |
बस पढ़ता और पढ़ाता हूँ ||