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Monday, November 2, 2015

जाके मन को खेती भावै



जाके मन को खेती भावै |



जाके मन को खेती भावै |

सुमित कुदार, ज्ञान कि गैंती, बंजर  खोदि  बहावै ||

प्रगति  बीज ,खेत  मंह  डाले,  अंकुर  स्नेह उगावै ||

प्रेम नीर  से  करे  सिंचाई , तन  सम  खेत  बनावै ||

बाल पौध को रोजहि निरखत, तृण को नोच बहावै ||

बरसा ,धुप ,ठण्ड को रोकत , तनिक न धैर्य गंवावै||

कहि 'आजाद' संत की किरपा, देखि फसल हरसावै ||





Sunday, November 1, 2015

दिल में बसा लिया है




दिल में बसा लिया है------- 


दिल में बसा लिया है तो फिर साथ दीजिये |
यदि  ऐसा  नहीं  है  तो  हमें  माफ़ कीजिये ||
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माना की मुझसे आपको नहीं कोई सरोकार ,
फिर  भी तो  गैर  जैसे  न  बरताव  कीजिये ||
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यह प्यार  खिलौना  नहीं जो खेले चल दिए ,
रखकर के  दिल पे  हाथ  ज़रा गौर कीजिए ||
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दिल तोड़कर के तुझको मिलेगा नहीं सुकून ,
आखिर तू अपने दिल से ये सवाल कीजिये ||
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टूटे  हुए  रिश्ते  बड़ी  मुश्किल  से  हैं  जुड़ते ,
बीते  हुए  लम्हों  को  फिर  से याद कीजिये ||
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बहके  हुए  कदमों को रोकना नहीं मुश्किल ,
'आजाद'  एक  बार  फिर  से  पहल कीजिये ||
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Friday, October 30, 2015

इस जिंदगी में जिसने


इस जिन्दगी में जिसने----



इस जिन्दगी में जिसने, खोये कभी न आस |
सचमुच में  जिन्दगी में ,वो  ही  हुए  हैं पास ||

तनहाइयों में पड़कर,  मानी न  जिसने  हार ,
पहचान दे गए हैं , दु निया को अपनी  ख़ास ||

जो दोस्त से नहीं मगर किये दोस्ती से प्यार ,
उनको तो दोस्त कर नहीं सकते कभी निराश ||

मुश्किल में डगमगाए नहीं ,जिनके कभी कदम ,
हासिल किये हैं मंजिल ,सह करके  भूख-प्यास ||

बदकिस्मती भी  जिनको , करती  सदा  सलाम,
मुठ्ठी में बन्द  रखते , किस्मत  जो  अपने  पास ||

परवाह   जो   न  करते,  मिले   जीत  चाहे  हार ,
किस्मत भी ऐसे लोग  की , करती  सदा  तलाश ||

तन्हां  भी    होके   जिसने,   रोके   नहीं   कदम ,
मंजिल भी  आगे-पीछे , फिरती   है  उनके  पास ||

'आजाद'  गम में  जिसने,  सीखा   कभी न  रोना ,
मासूमियत के   लम्हें,  टिकते   न   उनके   पास ||





Tuesday, October 27, 2015

यह कैसा अभिशाप है


यह कैसा अभिशाप है ?

लता है हर साल ये रावण |
मरता नहीं कभी ये रावण |
अग्निदेव भी हतप्रभ दिखते,
असर न करता ताप है |
यह कैसा अभिशाप है ?
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आती है हर साल दीवाली ,
हर दिल में लेकर खुशहाली | 
फिर भी रोज सुनाई पड़ता ,
सीता का करुण विलाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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जलती है प्रतिवर्ष होलिका ,
रंगों में प्रतिबिम्ब होलिका |
अमर गीत फागुन है गाता ,
मस्ती का आलाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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सच्चाई के पीछे छिपकर ,
झूठ सदा चलता आया है |
हलचल -सा जो श्रवनित होता ,
उसका है पदचाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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पुष्प सदा उपवन में ही खिलेगा |
न्याय अदालत में ही मिलेगा |
यारों ! सच के निर्धारण का ,
यह कैसा परिमाप है ?
यह कैसा अभिशाप है ?
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उपदेशों का बाजारों गरम है |
पैसा -पूजा ,धरम ,करम है |
वल्कल वस्त्रों के पीछे अब ,
मंजनूपन का छाप है ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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जिन्हें देश पर मरना चहिये,
वही देश को लूट रहे हैं |
श्वेत वस्त्र ,गाँधी की टोपी ,
सुरा सुंदरी ठाट हैं ||
यह कैसा अभिशाप है ?
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Monday, October 26, 2015

इस जिंदगी को

       इस जिन्दगी को

इस जिन्दगी को उसने सही मायने जिए |
जो मौत को भी हँसके गले से लगा लिए ||
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होती है कदर उनकी इस सारे अवाम में ,
जो जिन्दगी को खेल का हिस्सा बना लिए||
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बस जाते हैं वो दिल में उजड़ते नहीं कभी ,
जो हर दिलों में प्यार कि बस्ती बना लिए ||
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साहिल वो घबराये नहीं तूफ़ान में पड़कर ,
हिकमत से जो कश्ती को किनारे लगा लिए ||
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सच्चे वो हमसफ़र जिसे कोई नहीं फिकर ,
शिकवे गिले भी सुन के जिसने मुस्करा दिए ||
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डर डर के कभी वो नहीं जीते जहान में ,
'आजाद' जिसने  दाँव जिन्दगी लगा दिए ||
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Saturday, October 24, 2015

आदमी देखो पुराना हो गया है


        

        
      आदमी देखो पुराना हो गया है 

आदमी देखो पुराना हो गया है |
फिर भी कहता देखिये-
मौसम सुहाना हो गया है ||
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इन्द्रियों में है नहीं दम 
बात करने में नहीं कम ,
खिलखिलाते मजनुओं को देखकर 
कह रहा कैसा जमाना हो गया है ||
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तौलता है समय के पलड़े में रखकर 
कुछ पुरानी और कुछ नव संस्कृतियाँ 
और फिर कहने लगा कि-
दिल दीवाना हो गया है || 
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शर्म अब बेशर्म कि चादर लपेटे 
फिर रही बिंदास होकर देखिये 
और उनके पीछे हैं वो भेड़िये
शर्म और बेशर्म दोनों से अपरचित 
कह रहे दुनिया बेगाना हो गया है||      
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दूर से देखा लगा कोई कली है 
जो किसी रंगीन हाथों से पली है 
माल अच्छा है समझकर वो गए 
पर वो मायूस हो कहने लगे- 
माल यह काफी पुराना हो गया है|| 
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औरों कि सुनने से पहले अपनी बातें 
कहने लगता है चाहे दिन हो या रातें 
दर्द पुराने या कि नए-नए हों 
ऐसा रोया -रोया कहता -
मानो उसका कोई खजाना खो गया है ||
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Thursday, October 22, 2015

एक गीत


                    गीत

दिल में कोई बात को रखना नहीं चाहिए| 
अच्छी लगे या न लगे कहना चाहिए ||
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बहती नदिया बहती धारा, 
कहती हैं निश्चित मिलेगा किनारा ||
जीवन पथ पर बढ़ते साथी ,रुकना नहीं चाहिए ||
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दिल के अरमां आँसू बनकर ,
बह जाते हैं अगर किसी के ||
उनके इस हालात पे यारों ,हँसना नहीं चाहिए ||
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धरती,सूरज ,चाँद ,सितारे |
हर दम चलेंगे साथ तुम्हारे ||
कहता है ये नील गगन ,हमें झुकना नहीं चाहिए ||

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