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Monday, October 26, 2015

इस जिंदगी को

       इस जिन्दगी को

इस जिन्दगी को उसने सही मायने जिए |
जो मौत को भी हँसके गले से लगा लिए ||
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होती है कदर उनकी इस सारे अवाम में ,
जो जिन्दगी को खेल का हिस्सा बना लिए||
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बस जाते हैं वो दिल में उजड़ते नहीं कभी ,
जो हर दिलों में प्यार कि बस्ती बना लिए ||
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साहिल वो घबराये नहीं तूफ़ान में पड़कर ,
हिकमत से जो कश्ती को किनारे लगा लिए ||
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सच्चे वो हमसफ़र जिसे कोई नहीं फिकर ,
शिकवे गिले भी सुन के जिसने मुस्करा दिए ||
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डर डर के कभी वो नहीं जीते जहान में ,
'आजाद' जिसने  दाँव जिन्दगी लगा दिए ||
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Saturday, October 24, 2015

आदमी देखो पुराना हो गया है


        

        
      आदमी देखो पुराना हो गया है 

आदमी देखो पुराना हो गया है |
फिर भी कहता देखिये-
मौसम सुहाना हो गया है ||
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इन्द्रियों में है नहीं दम 
बात करने में नहीं कम ,
खिलखिलाते मजनुओं को देखकर 
कह रहा कैसा जमाना हो गया है ||
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तौलता है समय के पलड़े में रखकर 
कुछ पुरानी और कुछ नव संस्कृतियाँ 
और फिर कहने लगा कि-
दिल दीवाना हो गया है || 
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शर्म अब बेशर्म कि चादर लपेटे 
फिर रही बिंदास होकर देखिये 
और उनके पीछे हैं वो भेड़िये
शर्म और बेशर्म दोनों से अपरचित 
कह रहे दुनिया बेगाना हो गया है||      
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दूर से देखा लगा कोई कली है 
जो किसी रंगीन हाथों से पली है 
माल अच्छा है समझकर वो गए 
पर वो मायूस हो कहने लगे- 
माल यह काफी पुराना हो गया है|| 
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औरों कि सुनने से पहले अपनी बातें 
कहने लगता है चाहे दिन हो या रातें 
दर्द पुराने या कि नए-नए हों 
ऐसा रोया -रोया कहता -
मानो उसका कोई खजाना खो गया है ||
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Thursday, October 22, 2015

एक गीत


                    गीत

दिल में कोई बात को रखना नहीं चाहिए| 
अच्छी लगे या न लगे कहना चाहिए ||
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बहती नदिया बहती धारा, 
कहती हैं निश्चित मिलेगा किनारा ||
जीवन पथ पर बढ़ते साथी ,रुकना नहीं चाहिए ||
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दिल के अरमां आँसू बनकर ,
बह जाते हैं अगर किसी के ||
उनके इस हालात पे यारों ,हँसना नहीं चाहिए ||
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धरती,सूरज ,चाँद ,सितारे |
हर दम चलेंगे साथ तुम्हारे ||
कहता है ये नील गगन ,हमें झुकना नहीं चाहिए ||

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Tuesday, October 20, 2015

ये अलग बात है

              ये अलग बात है 

कोशिशें मैं भी करता हूँ ,निकम्मों में जगह पाऊं |
ये अलग बात है मुझको नहीं स्थान मिल पाता ||

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सोचता मौन होकर मैं भी देखूँगा नजारों को ,
ये अलग बात है चुप साधना मुझको नहीं आता ||

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मंजिल-ए-कामयाबी की तमन्ना मैं भी रखता हूँ |
ये अलग बात है मुझसे वहाँ पहुँचा नहीं जाता ||

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लोग कहते हैं चेहरे से सच्चाई साफ़ दिखती है |
ये अलग बात है मुझसे नहीं चेहरा पढ़ा जाता ||

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हौंसला मैं भी रखता हूँ बहानेबाज़ी करने की ,
ये अलग बात है 'आजाद' मुझसे हो नहीं पाता ||
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Friday, October 16, 2015

मेरो पिय परदेश सिधारे |

मेरो पिय परदेश सिधारे |


मेरो पिय परदेश सिधारे |


सिसक सिसक कर भई बावरी , 
                ढूरकत  अँसुवन    धारे||

खान-पान रंचहु नहीं भावे, 
                आवत     याद    तिहारे ||

काम काज में मन नहिं लागै, 
                 संध्या    और     सकारे ||

रात-रात भर नींद न आवै ,
                  हो    जावत    भिनसारे ||

मन तन छोरि सकल जग नाचै, 
                 रहत   न    पास   हमारे ||

नहिं 'आजाद' मनहिं कछु भावै, 
                जगत  लगत  न पियारे ||











Tuesday, October 13, 2015

आज़ाद के चौकड़े



      आज़ाद के चौकड़े

गुरु से कपट ,मातु-पितु चोरी ,
    अरु  ऊपर  से सीना जोरी |नहिं आजाद पावहिं जग ठौर ,
    चाहे  छोरा  या  हो  छोरी ||
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गुरु से ज्ञान ,मातु से ममता ,
    अरु भाई से भुजबल क्षमता |
कहि 'आजाद' पितु से निर्भयता ,
    पत्नी से सृजन की क्षमता ||
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मन से बैर उपरि से खैर ,
    वा से बढ़िया समझहु गैर |
कहि 'आजाद' निश्छल मोहिं भावै,
    चाहे आपुन  या  हो गैर ||
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धन बिनु धनी ,ज्ञान बिनु ज्ञानी ,
    जस चमकत मटकी बिनु पानी |
कहि 'आजाद' ऐसहि जन जग में ,
    जानि  बूझि  करते  नादानी ||
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सूरज दिवस ,चन्द्र से रजनी ,
    जीवन खेल चले नित धरनी |
कहि 'आजाद' जो होहि महाजन ,
    फरक न उनके कथनी करनी ||

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Thursday, October 8, 2015

कौल के वास्ते


                                 कौल के वास्ते


कौल के वास्ते जाँ निछावर करें ,
         आजकल इस तरह के कहाँ लोग हैं ?
कहने को हम तुम्हारे घणी यार हैं ,
         वक्त पर काम आते कहाँ लोग हैं ?
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धर्म से धर्म लड़ते ये कैसा धरम ,
         धर्म को धर्म कहने में आती शरम,
जिस धरम से किसी का भला हो अगर ,
         आजकल उस धरम पर कहाँ लोग हैं ?
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प्यार में कसमे वादे तो ऐसे किये,
         जैसे जन्मों जनम तक न टूटेगा ये ,
एक झोंका जिसे तोड़कर चल दिया ,
         आज रिश्ते निभाते कहाँ लोग हैं ?

 इक घरोंदा बनाया था जो प्यार का ,
         प्यार के रंग में जिसको था हमने रंगा,
आग नफरत की उसमे लगी इस कदर ,
         आग ऐसी  बुझाते कहाँ लोग हैं ?
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मुझको मालूम नहीं कब मेरे हो गए ?
         उनको मालूम नहीं कब मैं उनका हुआ ?
जिसमे वादे कसम की जगह भी नहीं , 
         आज 'आज़ाद ' ऐसे कहाँ लोग हैं ?
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