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Tuesday, August 11, 2015

देकर सहारा

देकर सहारा ------

देकर सहारा प्यार का ,तूने भुला दिया |
दिल लूट करके तूने मुझको दगा दिया ||

अब जा रहा हूँ दूर ,वफाओं के शहर में ,
क्योंकि किसी ने पास में मुझको बुला लिया ||

अब फिर नहीं मिलूँगा तुझसे वो मेरी जाँ,
क्योंकि खुदा ने पास में मुझको बुला लिया ||

बेकार आंसुओं की बरसात कर रही हो |
आज़ाद जब कफ़न का छाता लगा लिया ||

ये और वो

'ये' और 'वो'

ये कितने सरल, सुलझे और सबको साथ लेकर 
चलने वाले हैं |
ये नियम के पक्के ,झुझारू ,कर्मठ और स्वछंद 
विचारों वाले हैं |
ये बातों ही बातों में हँसाने वाले ,
अपनी छोटी-छोटी बातों में 
बड़ी बात कह जाने वाले हैं |
ये प्रजातंत्र के सम्मान को देश का सम्मान 
मानकर चलने वाले हैं |
सबको समदृष्टि से देखने वाले हैं |
ये बोलने लगते हैं तो ,
समय सीमा की परवाह नहीं करते हैं 
ये छल, कपट ,दंभ द्वेष से परे 
खुद स्वछन्द रहकर 
सबको स्वछन्द देखना चाहते हैं |
अपने व्यवहार व् वाणी से ,
कठिन काम को भी सरल बना देते हैं|
कृत्रिमता से कोसों दूर रहने वाले हैं |
नाज़ ,नखरे व क्रोध से परे रहकर 
ये पद की गरिमा को महत्त्व देते हैं |

और वो 
कितने अक्खड़  और जटिल स्वाभाव के थे |
जिसको समझना मुश्किल  ही नहीं ,
बहुत ही मुश्किल टेढ़ी -खीर |
और वो भी 
अपने हठनियम के पक्के, कर्मठ 
और व्यवहार कुशल थे |
जिसके कारन लोकप्रिय थे 
परन्तु 
यदि उनके सामने कोई दम हिलाए तो 
उसे महत्त्व देते थे |
सोचते थे कि काम आएगा 
यदि कोई उनके सम्मुख अपने विचार रखे तो 
वो उसे अपना अपमान समझकर 
उस पर रोब गांठते थे |
उनकी हाँ में हाँ मिलाने पर खुश होते थे |
वो अक्ल के पक्के तो थे -परन्तु 
एक कमी थी कि कान के कच्चे थे |
वो अपने शासन को अनुशासन 
अपने ही आदेश को सबसे बड़ा फ़र्ज़ समझते थे |
वो मजाक तो करते थे , परन्तु 
उसमे व्यंग्य होता था |
इसलिये लोग उनसे कतराते थे |
इसलिए वाही मिलते थे जो 
दुम हिलाते थे |

Friday, August 7, 2015

मेरी लेखनी

मेरी लेखनी 

मन में उठे विचार को कैसे बयाँ करूँ |
थी पास मेरी लेखनी सो उससे कह दिया ||
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इक बात तहे दिल में छिपा करके रखी थी |
लिख करके सरेआम वो सबको दिखा दिया ||

बातों ही बातों में मेरी हमदर्द कब बनी |
मुझको नहीं पता पर सबको बता दिया ||

रहती है हमसफ़र की तरह की पास ये मेरे |
चुपके से मेरे राज को बेराज कर दिया ||

मुझको नहीं आजाद तनिक भी भनक लगी |
पर सबको मेरी दास्ताँ इसने सुना दिया ||

Wednesday, August 5, 2015

वास्तविकता

वास्तविकता 

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अपनी बात सुनाने वालों ,
            औरों की नहीं सुनने वालों !
लाख करो पर सच्चाई से ,
            तुम मुह मोड़ नहीं सकते |
लाख दलीलें देने से तुम ,
             हरिश्चंद नहीं बन सकते ||

चाटुकारिता की कुंजी से ,
             कर्मठ ताले कभी न खुलते |
नजरें नीचीं कर लेने से ,
             पाप कभी नहीं यों धुलते |
औरों को अपमानित कर तुम ,
            श्रेष्ठ  कभी नहीं बन सकते ||

चिल्लाने से कभी नहीं अब ,
            काम तुम्हारा बनने वाला |
रँगे भेड़िये बनने से  अब ,
             सत्य नहीं है छिपने  वाला |
गीदड़ धमकी से तुम प्यारे ,
             बर्बर शेर नहीं बन सकते ||

कोरे धमकी से प्यारे अब ,
            कोई नहीं है डरने वाला |
युध क्षेत्र में शत्रु समक्षे ,
            वीरता का दे रहे हवाला |
डींग मारने से तुम प्यारे ,
            अफलातून नहीं बन सकते ||

रोज-रोज उपदेश सुनाकर ,
             धर्मजाल में उन्हें फंसाकर ,
मीठी बोली बोल-बोलकर,
             धर्मगीत की पंक्ति सुनाकर ,
वल्कल धारण कर लेने से ,
             धर्मराज नहीं बन सकते ||

हाँ में हाँ मिलाने वाले ,
              अपनी नहीं सुनाने वाले ,
दूजे के संकेतों भर से ,
              सच्ची बात छिपाने वाले ,
पिछलग्गू  रहकर प्यारे तुम ,
              नेता कभी नहीं बन सकते ||

नैन मटक्का करने वाले ,
             फ़िल्मी गीत सुनाने वाले ,
धौंस सुनी तो नौ दो ग्यारह ,
            संग-संग  जीने -मरने वाले |
प्रेम स्वांग करने से प्यारे ,
            मंजनू कभी नहीं बन सकते ||

बिना बात के हंसने वाले ,


            बिना बात के रोने वाले ,
हर कोई के सम्मुख ही ,
            अपना दुखड़ा रोने वाले ,
हे ! 'आज़ाद' कभी ऐसे जन ,
            जन आदर्श नहीं बन सकते ||

Friday, July 31, 2015

दिल में कोई बात

दिल में कोई बात को  रखना नहीं चाहिए 

दिल में कोई बात को  रखना नहीं चाहिए|
अच्छी लगे या न लगे  कहना चाहिए ||
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बहती नदिया बहती धारा |
कहती है निश्चित मिलेगा किनारा ||
जीवन पथ पर बढ़ते साथी रुकना नहीं चाहिए ||.....

दिल के अरमां आंसू बनकर ,
बह जाते हैं अगर किसी के |
उनके इस हालात पे यारों हँसना नहीं चाहिए ||

धरती, सूरज , चाँद , सितारे ,
हर दम चलेंगे साथ हमारे |
कहता है ये नील गगन हमें झुकना नहीं चाहिए ||

 

हक़ और हकीकत

हक़ और  हक़ीक़त 

हक़ और क्या हक़ीकत है ,
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            आज कल के ज़माने में |
देखा है कतल होते ,
            सरेआम आज थाने में |
अश्कों की नहीं कीमत ,
            पैसों के खजाने में |
दुश्मन भी बने साथी ,
            पैसे को दिखने में |
दिल जलता जलाता है ,
            जलने व जलाने में |
हैरत है इन अश्कों को , 
            आँखों से बहाने में |
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Wednesday, July 29, 2015

मैंने तुम्हारी चाह में

मैंने तुम्हारी चाह में 

मैंने  तुम्हारी   चाह  में   क्या-क्या  नहीं  किया ,
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फिर तुमने मुझको इस तरह से क्यों भुला दिया ||

जिस   दिल   के   आईने   में   तस्वीर  थी   मेरी ,
तुमने  वो  सरे   आम  क्यूँ  सबको  दिखा  दिया ||

मेरे   वास्ते   महफ़िल  में   कभी   रोक  नहीं था ,
किस   वास्ते   तुमने   वहाँ   पहरा   लगा   दिया ||

जब   सिजदे-मिन्नतों   का   कोई   दौर  नहीं  है ,
फिर दिल  के  मंदिरों  में  हमें  क्यों  बसा  लिया ||

माना    की   तुमने   मुझको   धोखा  नहीं  दिया ,
'आज़ाद '  जो    किया  वो  अच्छा   नहीं   किया ||
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