फूल और काँटा
फूल और काँटा
फूल ने कहा -कांटे सेतुम क्यों रहते मेरे संग चिपके चिपके |
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कुछ ऐसा मालूम होता है |
तुम न जाने क्या कभी कभी
कहते रहते चुपके चुपके |
क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-
भ्रमरों का दल गुंजार करे ?
क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-
मधुमक्खी मुझ पर मंडराए ?
क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-
यह पवन करे स्पर्श ,मेरे सुन्दर गलों का ?
क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-
सूर्य-चन्द्र की चंचल नजरें
मुझे निहारें कनखियों से |
इर्ष्या है तुमको मेरी सुन्दरता से ,
इर्ष्या है तुमको मेरी मधुर मधुरता से |
काँटा मुस्कराया , खिलखिलाया ,
बोला - धीरे से
बहुत नासमझ बड़ा बावला ,
क्यों इतना इतराता है ?
मैं तो बस इसलिए पास हूँ तेरे
दर लगता है कहीं किसी मानव के
चंगुल में न फंस जाए |
तुम्हे तोड़कर और सूंघकर
कहीं फेंक न आये |
इसीलिए मै तुम संग चिपका रहता
जिससे तेरी रक्षा करता|
लज्जित फूल बहुत अपने पर पछताया |
हाय जिसे मैंने कोसा और दुत्कारा |
उसके बल पर पर आज सुरक्षित तन-मन मेरा |





