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Saturday, July 25, 2015

फूल और काँटा

फूल और काँटा

                                   फूल और काँटा 

    फूल ने कहा -कांटे से
         तुम क्यों रहते मेरे संग चिपके चिपके |
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             है ह्रदय तुम्हारा कुटिल, कुलिश
                 कुछ ऐसा मालूम होता है |
                     तुम न जाने क्या कभी कभी
                     कहते रहते चुपके चुपके |

       क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-
             भ्रमरों का दल गुंजार करे ?
                  क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-   
                      मधुमक्खी मुझ पर मंडराए ?
                      क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-
यह पवन करे स्पर्श ,मेरे सुन्दर गलों का  ?
     क्या तुम्हे नहीं भाता है कि-
           सूर्य-चन्द्र की चंचल नजरें 
                मुझे निहारें कनखियों से |

                     इर्ष्या है तुमको मेरी सुन्दरता से ,
                     इर्ष्या है तुमको मेरी मधुर मधुरता से |

काँटा मुस्कराया , खिलखिलाया ,
बोला - धीरे से 
                              बहुत नासमझ बड़ा बावला ,
                              क्यों इतना इतराता है  ?
                              मैं तो बस इसलिए पास हूँ तेरे 
                              दर लगता है कहीं किसी मानव के 
चंगुल में न फंस जाए |
तुम्हे तोड़कर और सूंघकर 
कहीं फेंक न आये |

                               इसीलिए मै तुम संग चिपका रहता 
                               जिससे तेरी रक्षा करता|
                              लज्जित फूल बहुत अपने पर पछताया |
                               हाय जिसे मैंने कोसा और दुत्कारा |
                               उसके बल पर पर आज सुरक्षित तन-मन  मेरा |

परीक्षा

परीक्षा 

एक बार की बात परीक्षा निकट आ गई |
मानो मेरे लिए समस्या विकट आ गई ||
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               सपने आते ,रात-रात भर नींद न ढंग से आती ,
               पढ़ते-पढ़ते सारी रात जल्द ही बीत भी जाती ||
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सपने आते , ऐसे लगता ,मानो मैं कमरे में बैठा ,
प्रश्न -पत्र हाथों में लेकर, हल करने में पूरा तत्पर ||
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               एक प्रश्न था थोड़ा वैसा ,मानो नहीं कभी था देखा ,
               नहीं ज्ञात था उसका उत्तर ,फिर भी सोचा फिर भी देखा ||
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बहुत पैर सिर मारा लेकिन ,ज्ञात हुआ न उसका उत्तर ,
धड़कन बढ़ी  घड़ी जब देखा धीरे-धीरे समय भी खिसका ||
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                तेज -तेज से लिखे जा रहा ,प्रश्न नहीं पर ख़तम हो रहा ,
                लेख नहीं था कुछ भी सुन्दर ,फेल न हो जाऊं यह था डर||
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कभी-कभी तो लगता ऐसे ,प्रश्न छूट जायेंगे जैसे ,
प्रश्न छूट गर गये भला तो ,अच्छे अंक मिलेंगे कैसे ||
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                ख़तम हो गई पेन की स्याही , मैंने तब आवाज लगाईं ,
                सुनकर के आवाज़ मेरी तब ,दौड़ी-दौड़ी मम्मी आई ||
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नींद खुली तब मैंने देखा ,मैं बिस्तर पर पड़ा था लेटा,
न ही कलम था ,न ही था पेपर ,स्वप्न परीक्षा का था मुझ पर ||

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अम्बेडकरी कवच

अम्बेडकरी कवच

संविधान में संशोधन की बाढ़ आ गई |
        अनुच्छेद और धाराएँ सब तैर रही हैं |
             जाति धर्म की व्यापक लहरें उमड़ रही हैं |
                   लूट मची है नियमावली और अनुसूची की ,

नेताओं को नहीं फिक्र इस महाप्रलय से
         उनको तो बस जनमत और पद की अभिलाषा |
                अपनी कुर्सी सदा सलामत रहनी चहिये,
                      चाहे डूबे राष्ट्र या चाहे डूबे भाषा |


जाति धर्म और वर्ग-भेद की नौका लेकर,
         आरक्षण का लोभ दिखाकर जनमानस को ,
                 आरक्षण में आरक्षण का लालच देकर
                         मची खलबली आरक्षण के भीषण तट पर|

दलित समाज अभी सर उठा नहीं पाया है |
        जाति धर्म और छुआछूत अब भी उसके संग ,
              चंद जनों को प्रगति पंथ पर देख-देखकर ,
                     मानो औरों के हद सिमट हो गए तंग |

अम्बेडकरी कवच दलितों का एक सहारा ,
       डूब रहा संवि-संशोधन के महाप्रलय में |
             कर्ण कवच छीना था जैसे इन्द्रराज ने ,
                  दलित कवच भी छिना जा रहा संशोधन में |

आज एक अम्बेडकर की हो रही ज़रूरत,
         धाराओं को नई दिशा में मोड़ सके जो |
               दलित शोषितों के अधिकारों की नौका को ,
                     किसी सुरक्षित तट पर फिर से लगा सके जो |

दलितों के मसीहा

दलितों के मसीहा 

   दलितों के मसीहा तुम इक बार चले आओ |
   कानून लुटरों को कानून सिखा जाओ ||
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   बेखौफ घूमते हैं कानून के हत्यारे |
   कानून के रखवाले फिरते मारे-मारे |
   अब उनके लिए कोई कानून बना जाओ ||
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   संशोधन के बल पर कानून बनाते हैं |
   झूठे कसमें वादों से वे देश चलाते हैं ||
   ऐसे नेताओं को कानून सिखा जाओ ||
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   दलितों को लुटते हैं वे जाति बना करके |
   जनमत हासिल करते वे घर-घर जा करके ||
   अब फिर से उन्हें आकर इक बार जगा जाओ ||
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सुख दुख रहता है साथ

सुख -दुःख रहता है साथ -साथ 

       सुख -दुःख रहता है साथ-साथ ,
       कोई सुखी कोई दुखी कोई पड़ा बीमार है |
       कष्ट में देता बिता पूरी की पूरी रात-रात |
                  सुख -दुःख रहता है साथ-साथ ||

       कोई गाता है फिल्म गजल ,
       कोई गाता है गीत भजन |
       कोई रटता है नाम प्रभू ,
       सहता है कठिन से कठिन ताप |
                  सुख -दुःख रहता है साथ-साथ ||

       गीता और रमायन में ,
       बाइबिल और कुरान में,
       इक सच्चे इनसान में,
       वेद और पुराण में 
       सबमें मिलती है एक बात |
                 सुख -दुःख रहता है साथ-साथ ||

       सुख -दुःख जीवन का एक अंग ,
       रहता जीवन के संग-संग |
       जिस दिन जीवन का हुआ अंत ,
       सुख-दुःख ने छोड़ दिया साथ ||

             सुख -दुःख रहता है साथ-साथ ||


मेरी लेखनी

मेरी लेखनी 

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मन में उठे विचार को कैसे बयां करूँ |
थी पास मेरी लेखनी सो उससे कह दिया ||
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इक बात तहे दिल में छिपा करके रखी थी |
लिख करके सरेआम ओ सबको दिखा दिया ||
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बातों ही बातों में मेरी हमदर्द कब बनी |
मुझको नहीं पता मगर सबको बता दिया ||
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रहती है हमसफ़र की तरह पास ये मेरे |
चुपके से मेरे राज को बेराज कर दिया ||
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मझको नहीं आज़ाद तनिक भी भनक लगी |
पर सबको मेरी दास्ताँ इसने सुना दिया ||

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जिंदगी इस तरह से

जिन्दगी इस तरह से बसर कीजिए

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जिन्दगी इस  तरह से बसर कीजिए |
हाल  बेहाल  हो  ना, सबर  कीजिए ||
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मौत आ जाये कब कुछ पता ही नहीं, 
इसलिए हर समय की कदर कीजिए ||
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दिल की आहें किसी की ना ठुकराइए |
एक मौका मिला है पहल कीजिए ||
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म की यादों को मुस्कान के हाथ में,
सौंपकर इक सुरीली लहर दीजिये ||
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भीग जाये न यादों में पलकें कहीं ,
आँसुओं को न आँखों में घर दीजिये ||
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जिन्दगी को जिओ होके आज़ाद तुम ,
हर ख़ुशी के लिए ही समर कीजिए ||
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